बसपा अब वह ‘फटा हुआ नगाड़ा’ है जिसे कितना भी पीटो, जनता को रिझाने वाली आवाज़ नहीं निकल सकती है.

बसपा अब राजनीति की वह पुरानी घड़ी बन गई है, जो टिक-टिक तो करती है पर समय सही नहीं बताती. मायावती जी की सक्रियता अब केवल प्रेस नोट तक सिमट गई है. जनता सोच रही है कि बहनजी राजनीति कर रही हैं या ‘मौन व्रत’ का कोई विश्व रिकॉर्ड बना रही हैं. उनका प्रभाव अब ‘शून्य’ नहीं, बल्कि ‘माइनस’ में जा रहा है. जब राजनीति में कुछ करने को नहीं बचता, तो सुर्खियां ‘घरेलू कलेश’ से बटोरी जाती हैं. कभी उत्तराधिकारी का सस्पेंस, तो कभी पारिवारिक खींचतान—बसपा अब न्यूज़ चैनलों के लिए ‘पॉलिटिकल डिबेट’ का विषय ही नहीं रहा . फिर अचानक मायावती जी का ‘एकला चलो रे’ वाला मंत्र अब उस जिद्दी बच्चे जैसा हो गया है, जो पहले तो खेल बिगड़ने के डर से अपनी गेंद लेकर घर बैठ जाता है और खेल खत्म होने के बाद आगे शेखी बघारता है कि अगले खेल में देख लूंगा . 2027 के लिए अकेले लड़ने का ऐलान सुनकर सत्ताधारी दल तो ऐसे मुस्कुरा रहा है जैसे किसी ने मुफ्त में ‘बी-टीम’ का कूपन दे दिया हो जोकि केवल विपक्षियों के लिये “वोट कटुवा” बनेगी. बहनजी का हाथी अब रेस के मैदान में नहीं, बल्कि म्यूजियम में खड़ा होकर पुराने दौर की चिंघाड़ की रिकॉर्डिंग बजा रहा है. जब संगठन ही नहीं बचा, तो जंग कैसी? यह तो वही बात हुई कि सभी सिपाही साथ छोड़कर अपने अपने घर चले गए और सेनापति दीवार पर टंगी तलवार को देख कर कह रहा है—”देख लेना, अगली बार मैं अकेले ही किला फतह करूँगा!” राजनीति में ‘अर्श’ पर पहुंचना बहुत मेहनत का काम है, लेकिन ‘फर्श’ पर बने रहना उस निष्क्रियता का इनाम है जो बहन जी ने पिछले एक दशक में कमाया है.
इंजी. मधुर चितलांग्या , संपादक , पूरब टाइम्स , भिलाई

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