ट्रंप का ‘तेल-रोको दांव: बिना बम-बारूद, ईरान पस्त

कहते हैं कि जब सीधी उंगली से घी न निकले, तो उंगली टेढ़ी कर लेनी चाहिए। अरबों-खरबों डॉलर बारूद में फूंकने के बाद अमेरिका को समझ आया कि अब ज़माना है बिना बम-पटाखे के दुश्मन को धोबी पछाड़ देने का। होरमुज जलडमरूमध्य पर ईरान भाई साहब ऐसे कुंडली मारकर बैठे थे जैसे गली का कोई दादा रास्ता रोककर खड़ा हो। उन्होंने सोचा था कि जहाजों को डराएंगे और दुनिया की ‘तेल की नस’ दबाकर अपनी धोंस जमाएंगे। लेकिन ट्रंप जी भी पुराने खिलाड़ी हैं, उन्होंने साफ कह दिया— “बेटा, तुम डाल-डाल, तो हम पात-पात!” जब ईरान ने जहाज पकड़े, तो ट्रंप ने बड़े आराम से कह दिया कि वह हमारे नहीं थे, पर नज़र पूरी है। इसके बाद अमेरिका ने ऐसी नौसैनिक नाकाबंदी की कि ईरान के लिए ‘घर की मुर्गी दाल बराबर’ वाली स्थिति भी नहीं बची। ट्रंप का नया मंत्र है— “न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी।” यानी न बम गिराओ, न धुआं उठाओ; बस ईरान की जेब पर ऐसा ताला लगाओ कि चाबी समंदर में खो जाए। हालत यह है कि ईरान का तेल प्रोडक्शन तो जारी है, लेकिन उसे खरीदने वाला कोई नहीं। भंडार ऐसे लबालब भर गए हैं जैसे भारी सेल के बाद गोदाम। अब नौबत ‘आगे कुआं, पीछे खाई’ वाली है; अगर तेल निकालना बंद किया तो यूनिट्स ठप, और चालू रखा तो उसे संभालें कहां? बेचारा ईरान अब वैसे ही तिलमिला रहा है जैसे बिना पानी के मछली। जो नाकाबंदी वो दुनिया पर थोपना चाहता था, अब वही उसके गले की फांस बन गई है। इसे कहते हैं ‘चौबे जी गए थे छब्बे जी बनने, दुबे जी बनकर लौट आए।’ ईरान अब गिड़गिड़ा रहा है, पर अमेरिका ‘पत्थर की लकीर’ बना बैठा है और बिना बारूद के ईरान की हवा निकलना शुरू हो गई है।
इंजी. मधुर चितलांग्या ”माधो”
व्यंगकार व संपादक
दैनिक पूरब टाइम्स

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