मैं अपने यहां नए पत्रकारों और लेखकों को प्रशिक्षित कर रहा था . मैं उन्हें बताना चाह रहा था कि कैसे अपनी लेखनी में बेहतरी और पैनापन लाकर, वे अपने को जल्दी से जल्दी इस क्षेत्र में स्थापित कर सकते हैं . मैंने उन्हें पत्रकारिता की अलग-अलग विधा के बारे में बताना चालू किया . हास्य- व्यंग , फीचर, राजनीति , क्राइम, एजुकेशन, सामाजिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम, घटना –दुर्घटना , भ्रष्टाचार, स्टिंग इत्यादि पर कैसे रिपोर्टिंग करते हैं , बताते रहा . तभी एक नौजवान ने कहा कि पत्रकार को अपनी रूचि के हिसाब से कभी-कभार लिखना चाहिए बल्कि उस वक्त के पाठकों के मिजाज़ और फौरी आवश्यकतानुसार ही लिखना चाहिए , तभी उसके तेज़ी से ऊंचाई प्राप्त करने के,चांसेज रहेंगे . आज के राजनैतिक माहौल में कोई लव स्टोरी लिखे तो उसे बेहद कम पसंद किया जायेगा . युवक को तजुर्बा कम था पर उसकी बात में दम था . जब मैंने यह बात पत्रकार माधो को बताई तो वे हँसते हुए बोले आज की आवश्यकतानुसार मुझे लगता है कि मैं गाली राइटर बन जाऊं. चुनाव का मौसम है, घर की गली से लेकर संसद की दहलीज तक गालियों की जो बौछार हो रही है, उसे देखते हुए मैं गालियों का एक शोरूम खोलूँगा.” नेताओं की कद-काठी और उनकी नफरत की तीव्रता के हिसाब से गालियों का स्टॉक रखेंगे. उन्होंने अपनी गालियों को बाकायदा वर्गीकारण भी बताया . पहली श्रेणी रहेगी , ‘पशु-वाचक’: इसमें कुत्ता-गधा जैसे घिसे-पिटे शब्दों की जगह ‘अजगर सा आलसी’, ‘भेडिय़ा सा लालची’ और ‘गेंगड़वा सा लिज़लिज़ा’ जैसे हाई-टेक शब्द होंगे. दूसरी श्रेणी होगी ‘ऐतिहासिक पात्र’: जहाँ रावण और कंस तो अब आउटडेटेड हो चुके हैं, उनकी जगह ‘दुर्योधन सा लम्पट’ और ‘दुशासन सा अत्याचारी’ जैसे भारी-भरकम शब्दों का स्टॉक होगा. माधो तो यहाँ तक कह गए कि वे फिल्मी गालियां जैसे ‘रंजीत सी नीयत’ इत्यादि और ‘डिजिटल’ गालियां भी ईजाद करेंगे, जैसे ‘वायरस भरा पेन-ड्राइव’. उनका दावा है कि उनकी गालियां ‘चुनाव आयोग द्वारा प्रमाणित’ होंगी, जिन्हें देते वक्त नेता को सोचना नहीं पड़ेगा. माधो का यह गाली-प्रेम और उनकी लेखनी का ‘ट्रायल रन’ मुझ पर ही होने की आशंका देख, मैंने वहां से तुरंत नौ-दो-ग्यारह होने में ही भलाई समझी.
इंजी. मधुर चितलांग्या ‘ माधो’
व्यंगकार व संपादक
दैनिक पूरब टाइम्स


