अब रिपोर्ट कार्ड से नहीं, बल्कि ‘परेशानी’ के मीटर से तय होगा असम सीएम का रुतबा

राजनीति अब वह सर्कस है जहाँ विकास की बैलेंसिंग बीम नहीं, बल्कि अब नफरत की गहरी खाई पर जीत का झंडा गाड़ा जाता है. ऐसे ही , पिछले दिनों हेमंत बिस्वा सरमा के बयान , “ जब तक मैं सीएम रहूंगा, ‘मियां’ समुदाय को परेशानी होती रहेगी” , से राजनीति में तूफान खड़ा हो गया है. सही है , जब तक एक पक्ष को डराया न जाए, दूसरे पक्ष को अपनापन महसूस नहीं होता. यह राजनीति है साहब, यहाँ खाई गहरी होगी तभी तो जीत का पुल बनेगा और सत्ता का झंडा उतना ही ऊंचा लहराएगा ! असम मे चुनाव आ रहे हैं , नेताओं के बयान अब लोकतंत्र नहीं, बल्कि ‘चुनावी-तंत्र’ के लिए हैं , जहाँ मुद्दों की बलि दी जाएगी ताकि बयानों की फसल लहलहा सके. जनता को सड़क-बिजली मिले न मिले, पर मनोरंजन में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए. वैसे कुर्सी और कड़ाही का रिश्ता पुराना है, जितना ‘मियां’ नाम का तड़का लगेगा, वोट उतना ही कुरकुरा होगा. आप इस बयान को कैसे देखते हैं? समर्थन या विरोध—कमेंट में अपनी राय जरूर लिखिए क्योंकि राजनीति सिर्फ नेताओं की नहीं, हम सबकी है .
इंजी. मधुर चितलांग्या , संपादक , पूरब टाइम्स

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