अब फड़नवीस के लिए ‘चटपट’ सरकार बनाने वाला मैगी-मसाला बाजार से गायब हो गया है.

महाराष्ट्र की राजनीति में अजित ‘दादा’ उस ‘फास्ट फॉरवर्ड’ बटन की तरह थे, जिसे दबाते ही सरकार बनने का क्लाइमेक्स शुरू हो जाता था. उनके जाने से देवेंद्र फड़नवीस की हालत उस बल्लेबाज जैसी हो गई है जिसका ‘नॉन-स्ट्राइकर’ एंड वाला साथी बिना कॉल किए ही रन चुराने में माहिर था. पिछले चुनाव परिणाम के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक पत्रकार ने पूछा था कि शिंदे डिप्टी सीएम बनेंगे क्या? अजीत दादा ने कहा- “उनका पता नहीं, मैं तो शपथ ले रहा हूं.” इसके बाद अपने आप सारा खेल बदल गया था. अब महाराष्ट्र की राजनीति में वो ‘कॉन्फिडेंस’ कहाँ मिलेगा . कहते हैं दादा के रूप में फड़नवीस के पास राजनीतिक कवच था. अब कवच तो गया, पीछे बचे हैं एकनाथ शिंदे. जो खुद कब ‘गुवाहाटी’ का रूट मैप खोल लें, किसी को नहीं पता. असली एनसीपी बनाम नकली एनसीपी का झगड़ा तो खत्म हो गया, पर अब ‘सुप्रिया सुले’ के सामने सबसे बड़ी चुनौती ये है कि ‘दादा’ जैसा बेबाक जवाब देने वाला “दबदबेदार” कहाँ से लाएं? अब बारामती में उपचुनाव ऐसा होगा जैसे बिना ‘विलेन’ के मसाला फिल्म. राजनीति में सितारे तो डूबते हैं, पर यहाँ तो पूरी ‘गैलेक्सी’ ही कन्फ्यूज है कि अब लाइट जलाएगा कौन?
इंजी. मधुर चितलांग्या , संपादक , दैनिक पूरब टाइम्स

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