मैं बुद्धिजीवी जमात की वो ‘इंजीनियर्ड’ नस्ल हूँ , जो महफ़िलों में अंधश्रद्धा निर्मूलन पर लंबे-चौड़े भाषण झाड़ती है, पर सड़क पर बिल्ली रास्ता काट दे, तो ब्रेक ऐसे लगाते हैं मानो आगे साक्षात यमराज खड़े हों! मन ही मन दो बार ‘राम-राम’ जपकर प्रभु को अपनी आपदा ट्रांसफर करता हूँ और तब जाकर एक्सेलरेटर दबाता हूँ। चौराहे पर पड़ा नींबू-मिर्ची मेरे लिए किसी लैंडमाइन से कम नहीं, जिसके ऊपर से गाड़ी निकालना साक्षात मौत को दावत देना है। घर की छत पर काला मटका टांगने से लेकर, नुकसान होने पर वास्तु शास्त्री के तलवे चाटने और पत्नी के दबाव में उंगलियों को रत्नों की दुकान बनाने तक—मैंने सब किया है। बचपन में मां की ममता और ‘शास्त्री जी’ के टोटकों की जो घुट्टी पी थी, वह आज भी नस-नस में दौड़ती है। इस पाखंड से थककर जब मैंने पत्रकार माधो के सामने अपना दुखड़ा रोया और गिड़गिड़ाते हुए अंधविश्वास से मुक्ति का मार्ग पूछा, तो उन्होंने गंभीर होकर कहा, “अरे मधुर! तुम्हारा कोई दोष नहीं है। तुम टोटका-प्रोन छत्तीसगढ़िया हो! जब अंबानी और तेंदुलकर जैसे दिग्गज टोटकों के पिच पर बैटिंग कर सकते हैं, तो तुम तो ठहरे आम इंसान।” फिर उन्होंने अपनी जेब से एक चमचमाती चीज़ निकाली और बोले, “यह लो, पीर बाबा की सिद्ध ताबीज! इसे बांध लो, फिर ज़िंदगी में कभी किसी टोटके की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।” अब मैं सिर पकड़कर बैठा हूँ। अंधविश्वास से पीछा छुड़ाने के लिए मुझे एक ‘नया अंधविश्वास’ थमा दिया गया है! गजब का उपाय जैसे लोहा-लोहे को काट रहा हो । अब आप ही बताइए, इस महा-टोटके को आज़माकर ‘अंधविश्वास-मुक्त’ बनूँ या अपनी बची-कुची तार्किक बुद्धि का जनाज़ा निकालते रहूँ ?
इंजी. मधुर चितलांग्या “माधो “,
व्यंगकार व संपादक ,
दैनिक पूरब टाइम्स


