सत्ता की ‘जम्बूरी’ बनाम रसूख का ‘वंदे मातरम्’

छत्तीसगढ़ की राजनीति में आजकल ‘सुरों’ से ज्यादा ‘तेवरों’ का शोर है। विष्णुदेव सरकार ने जम्बूरी के सफल अयोजन के जरिए उंगली करने वालों की ‘उंगलियां’ क्या मरोड़ीं, अब सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने ‘वंदे मातरम’ के उद्घोष से अपनी दहाड़ सुनाने की ठान ली है। जम्बूरी के तेरह हजार बच्चों से सीधा , अपने क्षेत्र के पांच लाख बच्चों से वंदे मातरम् गवाना , यह आंकड़ा सिर्फ भक्ति का नहीं, बल्कि ‘शक्ति’ का भी है, क्योंकि टाइगर को यह बताना है कि वो अभी भी पिंजरे में नहीं है। एक तरफ सत्ता की ‘जादुई छड़ी’ है, तो दूसरी तरफ ‘अजेय महाबली’ का वजूद। इस रस्साकशी के बीच विपक्ष कोने में खड़ा होकर मजे ले रहा है ; वे इस अंतर्कलह की चिंगारी से अपनी बुझी हुई सियासी भट्ठी सुलगाने की ताक में हैं। पर उन्हें कौन समझाए कि जब हाथी आपस में टकराते हैं, तो घास सिर्फ कुचली जाती है, कटती नहीं . इस पर आपकी क्या राय है ?
इंजी. मधुर चितलांग्या , संपादक , दैनिक पूरब टाइम्स

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