दिल की बात -बड़े नुकसान के बाद भी ज़िंदगी रुकने का नाम नहीं , हौसलों से ही नई सुबह आती है

कुछ अर्से पहले एक परिचित की सड़क हादसे में मौत ने सबको झकझोर दिया था। उनके मासूम बच्चों और दहाड़ें मारती बिलखती पत्नी को देखकर कलेजा मुंह को आता था. मेरा एक मित्र बुदबुदा उठा —”हे ईश्वर! अब इन अनाथ बच्चों को कौन पालेगा?” इस हृदयविदारक दृश्य ने मेरे उस मित्र, जो रात-बिरात दूर-दराज की साइटों पर जाने वाले सरकारी ठेकेदार थे, के मन में ऐसा खौफ भर दिया कि वे अनहोनी की आशंका से डिप्रेशन में चले गए। व्यक्तिगत नुकसान के डर से उन्होंने काम पर जाना छोड़ दिया और खुद को घर में कैद कर लिया। लाख समझाने पर भी वे अतीत के उसी खौफनाक मंजर में अटके रहे। आखिरकार, तीन महीने बाद मैं उन्हें जबरन उसी पीड़ित परिवार के घर ले गया। वहां का नजारा हैरान करने वाला था। बच्चे आंगन में चहकते हुए पकड़म-पकड़ाई खेल रहे थे और दादी मुस्कुरा रही थीं। तभी दरवाजे पर एक संजीदा, आत्मविश्वास से भरी महिला की आहट हुई। वे दिवंगत भाई साहब की पत्नी थीं, जो अभी-अभी ऑफिस से लौटी थीं। चाय की चुस्कियों के साथ उन्होंने बताया, “पति के जाने के बाद मैं टूट चुकी थी, पर बच्चों के भविष्य के लिए मुझे जागना पड़ा। आज मैं उनका ऑफिस संभाल रही हूं।” उनकी आंखों में आंसू तो थे, पर हार की परछाई तक न थी। उन्होंने सिखा दिया कि जो खो गया वह लौट नहीं सकता, पर अपनों के लिए जीना ही सच्ची श्रद्धांजलि है। व्यर्थ की चिंता छोड़ें, हर परिस्थिति में आगे बढ़ने का संकल्प लें और विजेता बनें।
इंजी. मधुर चितलांग्या “ माधो “
संपादक , दैनिक पूरब टाइम्स

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