जानिये , ईश्वर दयालु हैं या न्यायप्रिय ?

एक बार मेरे पिता के अभिन्न मित्र और कर्मकांडी विद्वान श्री महेश्वर प्रसाद जी पांडे भिलाई आए। चर्चा के दौरान एक प्रश्न उठा— ईश्वर दयालु है या न्यायप्रिय? उपस्थित लोगों के बीच तर्क छिड़ गया। किसी ने कहा, “ईश्वर जज की तरह न्यायप्रिय है,” तो किसी ने तर्क दिया, “बिना दया के ईश्वर कैसा?” सब असमंजस में थे कि ईश्वर न्यायप्रिय व दयालु दोनों हैं, पर कब व कैसे?
तभी मुझे बचपन में सुनी संत गोंदवलकर जी महाराज की एक बात याद आ गई। उन्होंने इस गुत्थी को बड़े सुंदर ढंग से सुलझाया था। महाराज जी के अनुसार, ईश्वर सकाम भक्तों के लिए ‘न्यायप्रिय’ और निष्काम भक्तों के लिए ‘दयालु’ है। अर्थात्, यदि हम फल की इच्छा (सकाम) से पूजा या कर्म करते हैं, तो प्रभु हमारे गुण-दोषों के आधार पर न्याय करते हैं। लेकिन जब कोई बिना किसी स्वार्थ के स्वयं को समर्पित कर देता है, तो प्रभु उस पर अपनी असीम दया बरसाते हैं। यही नियम प्रकृति पर भी लागू होता है। यदि हम केवल फल के लिए कार्य करते हैं, तो प्रकृति हमें योग्यतानुसार प्रतिफल देती है। किंतु यदि हम कर्म को ही पूजा मानकर, समर्पण भाव से ‘निष्काम’ होकर कार्य करते हैं, तो पूरी प्रकृति हमारी सहयोगी बन जाती है। अतः जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम – आप प्रतिफल की चिंता छोड़ निष्काम कर्मयोगी बन सकें . इस शुभेच्छा के साथ आज का अंक समर्पित…
इंजी. मधुर चितलांग्या ‘ माधो ‘
संपादक , दैनिक पूरब टाइम्स

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