दिल की बात – माता-पिता: वो ‘फिक्स्ड डिपॉजिट’, जिसका ब्याज हम बच्चों पर लुटा रहे हैं

नैतिक मूल्यों की हर किताब हमें यही सिखाती है कि माता-पिता ईश्वर का वह साकार रूप हैं, जो अपनी हसरतों की चिता जलाकर हमारी सफलताओं का मार्ग प्रशस्त करते हैं। वे अपना सर्वस्व उस यज्ञ में होम कर देते हैं ताकि उनकी संतानें उन ऊंचाइयों को छू सकें, जहाँ तक वे खुद कभी नहीं पहुँच पाए। हम सबने उनके इस निस्वार्थ त्याग को महसूस किया है, पर विडंबना देखिए कि आज के दौर में रिश्तों के मायने कितने बदल गए हैं। आज हम अपने बच्चों के लिए तो ‘स्मार्टफोन’ बन गए हैं—जो हर पल अपडेट है और हर फरमाइश पर हाजिर। लेकिन वही माता-पिता हमारे लिए घर के किसी कोने में पड़े उस पुराने ‘लैंडलाइन’ की तरह हो गए हैं, जिसकी घंटी बजते ही हम खीझ उठते हैं कि “अब इन्हें क्या समझाऊं!” यह हमारे समय की सबसे क्रूर सच्चाई है कि हम बच्चों को ‘फ्यूचर स्टॉक’ मानकर निवेश करते हैं ताकि बुढ़ापे में ‘रिटर्न’ मिल सके, जबकि माता-पिता हमें अपनी किस्तें पूरी कर चुके उस ‘रिटायर्ड अकाउंट’ की तरह लगने लगते हैं जिसमें अब कुछ शेष नहीं।हम कलियों (बच्चों) को खिलाने के लिए सारा खाद-पानी तो छिड़क रहे हैं, पर उन जड़ों (माता-पिता) को भूल गए हैं जिनसे हमारा अस्तित्व है। अक्सर किसी फिल्म या प्रवचन को सुनकर हमारी आँखों में श्रद्धा के आँसू तो आते हैं, पर वह संवेदना चार दिन भी नहीं टिकती। याद रखिए, ढलती उम्र में माता-पिता को सेवा की नहीं, उसी ममता की जरूरत होती है जो उन्होंने हमें बचपन में दी थी। अब समय है कि हम उन्हें बोझ नहीं, बल्कि प्रभु का सबसे अनमोल वरदान समझें। जो जड़ों का सम्मान करना जानते हैं, उनकी ही पीढ़ियां फलती-फूलती हैं।
इंजी. मधुर चितलांग्या
सम्पादक, दैनिक पूरब टाइम्स

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