क्या खाद्य विभाग दुर्ग जनता के राशन का कर रहा है बंदरबाट ?

पूरब टाइम्स, दुर्ग. पिछले कुछ महीने से दुर्ग के खाद्य विभाग की अनियमित व अविधिक कार्यशैली सुर्खियों में है . अनेक अनियमित राशन दुकानों को आबंटन व उन दुकानों द्वारा नियमानुसार काम नहीं करना , मुख्य रूप से खाद्य विभाग दुर्ग पर आरोपित किया जा रहा था . खाद्य नियंत्रक दुर्ग द्वारा कोई कार्यवाही नहीं करने के कारण , अनेक राशन दुकान वाले “ सैंया भये कोतवाल अब डर काहे का “ की तर्ज़ पर काम कर रहे थे . जब पानी सर के ऊपर चढ़ने लगा तो अनेक समाजसेवकों व विसिल ब्लोवर ने खाद्य नियंत्रक दुर्ग को नोटिसों के माध्यम से मजबूर किया कि वे अनियमित दुकानदारों के लाइसेंस कैंसल कर , नये सिरे से दुकानों का आबंटन करें . यह सब कार्यवाही कर खाद्य नियंत्रक अपनी बला टालने लगे परंतु लोगों का कहना है कि अपने पुराने कर्मों का हिसाब उनको देना ही पड़ेगा . अब खाद्य नियंत्रक की शिकायतें हर स्तर पर कलेक्टर से मंत्रालय तक होने लगी हैं . नियमों की अवहेलना की जवाबदेही के लिये आरटीआई एक्टिविस्ट व सोशल ऑडिट करने वाले लोगों ने अब कमर्कस ली है . देखने वाली बात यह है कि खाद्य नियंत्रक दुर्ग क्या खुद इस कीचड़ में लिप्त थे या फिर अपने कार्यालय के पुराने ढर्रे में चलने के कारण बाबुओं के कारण आंखों में पट्टी बांधे रहने का शिकार हुए हैं . पूरब टाइम्स की एक रिपोर्ट

दुर्ग: जिला दुर्ग में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के क्रियान्वयन में गंभीर विसंगतियों और कानूनी प्रावधानों की अनदेखी का मामला सामने आया है। “छत्तीसगढ़ सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पारदर्शिता एवं जवाबदेही) नियम 2017” के तहत अनिवार्य प्रावधानों का पालन न होने से नाराज प्रबुद्ध नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं व खाद्य विभाग के अनियमित्ताओं से पीड़ित स्व-सहायता समूहों की व्यथा का क़ानूनी निराकरण के लिए सामाजिक कार्यकर्त्ता अमोल मालुसरे ने जिला कलेक्टर दुर्ग को एक विधि-सम्मत ज्ञापन सौंपकर त्वरित कार्यवाही की मांग की है।

कलेक्टर को सौंपे गए ज्ञापन में स्पष्ट किया गया है कि नियम 2017 के अध्याय 3 की कंडिका 4(2)(ग) के तहत राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) एवं छत्तीसगढ़ खाद्य तथा पोषण सुरक्षा अधिनियम (CFNSA) के प्रभावी व पारदर्शी संचालन के लिए सभी राशन दुकानों के अभिलेखों की सामाजिक संपरीक्षा (Social Audit) कराया जाना कानूनी रूप से अनिवार्य है। नोटिसकर्ता ने आरोप लगाया कि वर्तमान में दुर्ग जिले के भीतर इस महत्वपूर्ण विधि-निर्देश की निरंतर अवहेलना की जा रही है। धरातल पर सोशल ऑडिट न होने के कारण पूरी राशन वितरण प्रणाली में पारदर्शिता का सर्वथा अभाव दिख रहा है, जिससे गरीब और जरूरतमंद हितग्राहियों के अधिकारों के हनन की आशंका बनी हुई है।

तत्काल सोशल ऑडिट का आयोजन: नियम 2017 के तहत दुर्ग जिले की सभी उचित मूल्य दुकानों (Ration Shops) और उनके दस्तावेजों की सामाजिक संपरीक्षा के लिए तुरंत समय-सारणी (Schedule) जारी की जाए। अभिलेखों को सार्वजनिक करना: पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए राशन वितरण, स्टॉक पंजी और आवंटन से जुड़े दस्तावेजों को ग्राम सभा व वार्ड स्तर पर आम नागरिकों के निरीक्षण हेतु सुलभ कराया जाए। प्रशासनिक शिथिलता पर कार्रवाई: लोकहित के इतने बड़े नियमों के क्रियान्वयन में लापरवाही बरतने वाले जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए। निगरानी समितियों की सक्रियता: स्थानीय स्तर पर सतर्कता एवं निगरानी समितियों को पुनर्गठित कर उन्हें सोशल ऑडिट की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल किया जाए।

राशन वितरण प्रणाली सीधे तौर पर गरीब जनता के पेट से जुड़ी हुई है। यदि प्रशासनिक स्तर पर पारदर्शिता की अनदेखी होगी, तो भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा। अतः संज्ञान करवाकर चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही नियम सम्मत सोशल ऑडिट की समय-सारणी जारी नहीं की गई, तो वे इस मामले को लेकर आगे मुखर होना पड़ेगा परंतु उम्मीद है कि जिला प्रशासन इस गंभीर विषय को संज्ञान में लेते हुए संबंधित खाद्य अधिकारियों को विधि-निर्देशों का कड़ाई से पालन करने हेतु कड़े निर्देश जारी करेगा।

सामाजिक कार्यकर्त्ता अमोल मालुसरे

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