अध्यक्ष तहसीलदार संघ, जनता के मौलिक अधिकार का हनन मत करिये …इस तरह के विरोध प्रदर्शन वाली नौटंकी पर विराम लगाईये..

पूरब टाइम्स, रायपुर. पिछले दिनों सरगुजा जिले के सीतापुर ( राजापुर ) में भाजपा विधायक रामकुमार टोप्पो और नायब तहसीलदार तुषार मानिक के बीच एक विवाद ने बड़ा रूप ले लिया . कथित मारपीट के बाद उपजे विवाद के कारण राज्य के 500 से अधिक तहसीलदार व नायब तहसीलदार अनिश्चित कालीन हड़ताल पर चले गये. राजधानी में डेरा डाले इन अधिकारियों को पटवारी और राजस्व निरीक्षक संघ का भी समर्थन मिल गया, जिससे कामकाज पूरी तरह से ठप है . आम जनता वैसे ही राजस्व विभाग के अनेक अधिकारियों व कर्मचारियों के द्वारा की जाने वाली देरी व भ्रष्टाचार से पीड़ित हैं, ऐसे में राजस्व विभाग का अपराधिक प्रकरण के विरोध में अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाना, आम लोगों में उनके प्रति आक्रोश भर देता है.सूत्रों के अनुसार राजस्व विभाग के कुछ नेता गण अधिकारी इस मौके अर अपनी ताक़त दिखा कर, राजनीतिक रोटियां सेंकना चाहते हैं. ऐसे में यदि उन नेताओं के कार्यों की राजस्व संहिता व विधिनुसार समीक्षा की जाये तो दूध का दूध पानी का पानी हो जायेगा.

लोकतंत्र में अपनी मांगों को सरकार के सामने रखना हर संगठन का अधिकार है, लेकिन जब यह अधिकार आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों और उनकी दैनिक ज़रूरतों को बंधक बनाने लगे, तो इस पर सवाल उठना लाज़मी है। वर्तमान में तहसीलदार संघ द्वारा की जा रही क्रमबद्ध हड़ताल कुछ ऐसा ही दृश्य पैदा करने जा रही है। ‘अध्यक्ष तहसीलदार संघ, खबरदार रहिये! विरोध प्रदर्शन वाली नौटंकी पर विराम लगाइये!’ जैसे नारे आज उस आम जनता की आवाज़ बन चुके हैं, जो तहसील कार्यालयों के चक्कर काट-काटकर थक चुकी है। इसलिए अब तहसीलदार पद पर विराजमान अधिकारियों की जवाबदेही तय करवाने की जरूरत महसूस होने लगी है।

अपनी जायज़-नाजायज़ मांगों के लिए पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को ठप कर देना किसी भी समझदार संगठन को शोभा नहीं देता। विशेषकर तहसीलदार संघ को कतई नहीं देता क्योंकि जनता के टैक्स से वेतन पाने वाले ये अधिकारी जब जनहित को ही भूल जाएं, तो उनके इस विरोध प्रदर्शन को ‘अधिकारों की लड़ाई’ नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारियों से भागने वाली ‘नौटंकी’ ही कहा जाएगा। चर्चा और संवाद के रास्ते हमेशा खुले रहते हैं, लेकिन काम बंद करके आम लोगों को ढाल बनाना प्रशासनिक गरिमा के खिलाफ है। तहसीलदार संघ के नेतृत्व को यह समझना होगा कि जनता का सब्र अब जवाब दे रहा है। अपनी निजी और तर्क विहीन सांगठनिक मांगों के लिए लाखों लोगों के दैनिक जीवन को प्रभावित करना न्यायसंगत नहीं है।

तहसीलदार काम रोककर जनता को परेशान कर रहे । जबकि तहसीलदार स्वयं पदेन और बौद्धिक दोनों ही स्तरों से न्यायालयीन कार्यवाही प्रक्रिया विषयक सक्षम है । इसकी तहसीलदार संघ को तुरंत हड़ताल और विरोध प्रदर्शन पर विराम लगाना चाहिए और बातचीत के ज़रिये रास्ता निकालना चाहिए और ऐसा नहीं हो तो न्यायालय जाना चाहिए। तहसीलदारों को यह समझ लेना चाहिए कि, प्रशासन का काम जनता की सेवा करना है, उन्हें परेशान करना नहीं है। यदि नौटंकी प्रदर्शन वाली हड़ताल का गतिरोध जल्द ही समाप्त नहीं हुआ, तो जनता का आक्रोश और अधिक मुखर होना तय है। जिस विषयक पहल करते हुए अध्यक्ष तहसीलदार संघ को उनकी पदेन जिम्मेदारी के निर्वहन की वस्तुस्थिति का बोध करवाने वाली विधिक कार्यवाही प्रारंभ की जायेगी।

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