मोती, धान-चावल, बीज और रक्तमौली धागों से तैयार राखियों में दिखा स्थानीय हुनर और पर्यावरण संरक्षण का संदेश
रायपुर। छत्तीसगढ़ में धान, चावल और रक्तमौली धागों से बनी हस्तनिर्मित इको-फ्रेंडली राखियां सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बनकर आकर्षण का केंद्र बनी हैं। इन्हें स्थानीय महिला स्व-सहायता समूहों और छात्रों द्वारा विशेष कलात्मकता के साथ तैयार किया जा रहा है।
रक्षाबंधन पर्व के अवसर पर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं के हुनर और रचनात्मकता को नई पहचान मिल रही है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) से जुड़ी स्व-सहायता समूहों की महिलाओं द्वारा स्थानीय एवं प्राकृतिक सामग्री से तैयार की गई हस्तनिर्मित राखियां आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।
इको-फ्रेंडली राखियों की विशेष बिक्री एवं प्रदर्शनी के लिए स्टॉल लगाया गया
हस्तनिर्मित इको-फ्रेंडली इन राखियों में मोती, नग, धान-चावल, रक्तमौली धागों के साथ विभिन्न प्रकार के बीजों का उपयोग किया गया है, जो स्थानीय कला, नवाचार और पर्यावरण संरक्षण का अनूठा संगम प्रस्तुत करती हैं।
जांजगीर-चांपा जिले के कलेक्टोरेट परिसर में बिहान की महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा तैयार राखियों की विशेष बिक्री एवं प्रदर्शनी के लिए स्टॉल लगाया गया। कलेक्टर श्री जन्मेजय महोबे ने स्टॉल का अवलोकन किया और महिलाओं से संवाद कर उनके द्वारा तैयार हस्तनिर्मित राखियां खरीदीं। उन्होंने महिलाओं की रचनात्मकता, मेहनत और हुनर की सराहना करते हुए उन्हें प्रोत्साहित किया।


