डॉ. मोदी का क्लिनिक’ और विज्ञापनों का जादू

राजनीति के इस अस्पताल में 2009 की कांग्रेस सरकार ‘जादू की छड़ी नहीं है’ कहकर अपने 100 दिन में महंगाई कम करने के वादे से मुकर गई, तो 2014 में बीजेपी ‘कड़वी दवा’ का पर्चा थमाकर आ गई। पहले कार्यकाल में रेल भाड़ा, नोटबंदी और जीएसटी की गोलियां दी गईं। दूसरे में सीएए, एनआरसी, धारा 370 और अचानक लगे लॉकडाउन के बड़े ऑपरेशन हुए। जिसमें धारा 370 हटाना एक बहुत बड़ी उपलब्धि था. तीसरी पारी में लगा कि मर्ज अब ठीक होगा, पर महंगाई और बेरोजगारी की बीमारी बरकरार रही। ऊपर से ‘कॉकरोच’ नाम के नए वायरस ने तो सरकार के एक मंत्री तक को चट कर दिया! अब ढाई साल बाकी हैं, तो डॉ. मोदी फिर से सीटी स्कैन, एमआरआई और डबल डोज की तैयारी में हैं।
जब मैंने इस कार्यकाल के 100 दिन के सफल एक्शन प्लान और ‘मोदी जी नहीं तो कौन?’ का तर्क दिया, तो पत्रकार माधो अपनी चिर-परिचित मुस्कान के साथ बोले:
• रिपोर्ट कार्ड का सच: “100 दिन की सफलता वाली बुकलेट तो अस्पताल का चमचमाता ब्रोशर है, जबकि मरीज आज भी लाइन में ही खड़ा है।”
• ग्लोबल बहाना: “दुनिया में युद्ध हो, तो अपने घर के सिरदर्द का ठीकरा भी पड़ोसी पर फोड़ना आसान हो जाता है।”
• विज्ञापन का तिलिस्म: “अगर विज्ञापनों में वाकई सच्चाई होती, तो हाइट बढ़ाने की दवा खाकर सचिन तेंदुलकर आज भी ‘लिटिल मास्टर’ न कहलाते! और अगर ‘सर्व-सिद्ध अंगूठी’ से मुरादें पूरी होतीं, तो राहुल बाबा की यह दुर्दशा क्यों होती?”
इतना कहकर माधो भाई ठहाका मारकर गाने लगे— “यार दगा दे गया, दुल्हन को ले गया… दिखावे पर न जाओ, अपनी अक्ल लगाओ!”
इंजी. मधुर चितलांग्या “माधो”
व्यंगकार व संपादक
दैनिक पूरब टाइम्स

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