(युवा अवस्था में कॉलेज की दोस्ती क्या-क्या गुल खिलाती है ? पिछले रविवार से शुरू किया एक धारावाहिक. इंदौर के श्री गोविंदराम सेक्सरिया इंजीनियरिंग कॉलेज में बिताये अपने खूबसूरत लम्हों को अपने दोस्तों व घटनाओं के साथ पिरोते हुए, मेरे वो ख्वाबों के दिन भाग – 2 )
मैंने बिट्स पिलानी से लगभग 2 माह की पढ़ाई छोड़ , इंदौर इंजीनियरिंग कॉलेज में अपनी पढ़ाई जारी रखी थी. रीगल टाकीज़ के सामने रानीसराय हॉस्टल में सभी फर्स्ट इयर के लड़के रखे गए थे. पहले रविवार को हॉस्टल रूम में रुका था , पर पहली ही रैगिंग में इतने थप्पड़ खाए थे कि गाल सूज गए थे. अनेक लड़कों की तरह मैं भी शुक्रवार को ही हॉस्टल से भाग खड़ा हुआ था .
शनिवार को अपनी दीदी के घर की बालकनी के झूले पर बैठा मैं एक ग़ज़ल सुन रहा था . तभी एक सुन्दर सा युवा मुझे देखकर मुस्कुराते और वेव करते हुए जाल ऑडिटोरियम की तरफ से पैदल निकला . थोड़ी कम हाइट थी पर था थोड़ा हेल्दी . मुझे लगा मैं उसे पहचानता हूँ. मैंने ऊपर से ही आवाज़ लगाईं , सुनो यार , रुको . वह रुका , मैं नीचे जा पहुंचा उससे मिलने . मैंने पूछा क्या वह मेरे कॉलेज का है ? तो वह हँसते हुए बोला , तुम्हारी क्लास और तुम्हारे हॉस्टल का हूँ . मैंने झेंपते हुए कहा कि मेरा एडमिशन बाद में हुआ था . वह फिर हँसते हुए मेरे सूजे हुए गालों को देखते हुए बोला , पर तुम अपनी पहली जनरल रैगिंग में थप्पड़ खाने में सबसे आगे थे. अब मैं भी हंस पड़ा . यह नीरज था, नीरज जैन. जो फर्स्ट इयर के बाद अगले चार साल मेरा रूम मेट रहा.
इससे पहले मेरा रूम मेट , चंद घंटों में ही मेरा पक्का दोस्त बन चुका था . वह था हितेश परसाई ( पिछले हफ्ते मैनें उसके बारे मे लिखा था ) . उससे मुलाकात भी अजीब ढंग से हुई थी. कॉलेज में लेट एडमिशन के कारण हॉस्टल के ऊपर के सभी रूम भर गए थे . ग्राऊण्ड फ्लोर में कॉलेज के स्टाफ रहते थे , परन्तु केवल दो कमरों में स्टूडेंट रहते थे. जिसमे से केवल एक कमरे में एक सीट खाली थी . मैं अपने जीजाजी के साथ रविवार को अपना पूरा सामान लेकर हॉस्टल गया. वार्डन साहब का स्टाफ हमें लेकर नीचे के रूम पर ले गए . वह रूम अंदर से बंद था. स्टाफ बहुत देर तक रूम भड़भड़ाता रहा तब एक दुबले-पतले छोटे से गोर चिट्टे खूबसूरत लड़के ने रूम खोला. दिन के 11 बजे थे , वह अभी भी ज़ोर ज़ोर से आंखें मल रहा था . मुझे मिलवाकर जब वह स्टाफ और जीजाजी वापस चले गए तो वह ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगा. मुझे बेहद अजीब लगा . तो वह बोला , जब रूम भड़भड़ा रहे थे तो उसकी म्यूसिक में मैं डांस कर रहा था. अच्छा बुद्धू बनाया. मेरे चेहरे पर मुस्कान देखकर वह बोला , चल फिर डांस करते हैं. फिर अपने मुंह से म्युज़िक निकालकर ज़बरदस्ती मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर डांस करने लगा . मुझे फिर अजीब लगा पर मज़ा भी आ रहा था. यह मेरा इंदौर के हॉस्टल का पहला दिन और पहला घंटा था.
दोस्ती कर के देखो, दोस्ती में दोस्त खुदा होता है;
यह एहसास तब होता है जब दोस्त, दोस्त से जुदा होता है
(अगले हफ्ते, अनुभव दोस्तों के साथ )
इंजी. मधुर चितलांग्या
एसजीएसआईटीएस


