हमारे देश में चाहे जो भी सरकार रहे ‘राजद्रोह’ का एक थर्मामीटर यह भी है, अगर आप सरकार की तारीफ नहीं कर, बड़ी खामियां निकाल रहे, तो आप ‘देशद्रोही’ हैं. वांगचुक जी का अपराध यह था कि वे लद्दाख के पर्यावरण और संवैधानिक अधिकारों की बात कर रहे थे. सरकार ने उसे ‘राजद्रोह’ के तराजू में तौला. जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “जरा वजन तो दिखाइए,” तो सरकार ने पाया कि तराजू में तो सिर्फ हवा और कुछ पुरानी फाइलों के अलावा कुछ था ही नहीं. फिल्मों में तो क्लाइमेक्स आधे घंटे का होता है, यहाँ क्लाइमेक्स 170 दिन का था. जब सरकार को लगा कि सुप्रीम कोर्ट की फटकार अब ‘सुपर-फास्ट’ होने वाली है, तो रातों-रात स्क्रिप्ट बदल दी गई. रिहाई ऐसे हुई जैसे किसी फिल्म में विलेन अचानक ‘सद्बुद्धि’ प्राप्त कर ले. वैसे सरकार ने वांगचुक पर जो मामले लगाए, वे इतने पुख्ता थे कि सरकार खुद ही उन्हें अदालत में साबित नहीं कर पाई. या तो सरकार के पास सबूत थे ही नहीं, या फिर उन्होंने ‘सबूत’ की जगह ‘सबक’ सिखाने वाली फाइलें कोर्ट में पेश कर दी थीं. आखिर में खुद को हंसी का पात्र बनते देख केस वापस लेना ही सबसे ‘बुद्धिमान’ फैसला था. कहते हैं, अंत भला तो सब भला. वांगचुक बाहर आ गए, केस वापस हो गया. लेकिन उन 170 दिनों का क्या, जो एक बेगुनाह ने कालकोठरी में बिताए? क्या सरकार उन दिनों का ‘मुआवजा’ विकास के रूप में लद्दाख को देगी? अगर ऐसा होता है तो इससे बेहतर मुआवजा वांगचुक व लद्दाख के लिये कुछ नहीं हो सकता है .
इंजी. मधुर चितलांग्या
व्यंगकार व संपादक


