आजकल के युवाओं का मानना है कि मसल्स डंबल उठाने से नहीं, बल्कि जिम की महंगी फीस से बनती हैं। अगर जिम में एसी न हो, महंगे इक्विपमेंट न हो और रिसेप्शनिस्ट ‘हेलो’ न बोले, तो उन्हें लगता है वहां बॉडी बन ही नहीं सकती। अगर कोई बुजुर्ग पार्क में शांति से वॉक कर रहा हो या योग कर रहा हो, तो ये ‘जिम वाले चूजे’ उन्हें ऐसे देखते हैं जैसे वे पाषाण युग के प्राणी हों। वैसे जिम जाने का मुख्य उद्देश्य पसीना बहाना नहीं, बल्कि शीशे के सामने सही ‘एंगल’ ढूँढना है। जिम के भारी-भरकम डंबल सिर्फ इसलिए उठाए जाते हैं ताकि फोटो में बाइसेप्स थोड़े उभरे हुए दिखें। अगर जिम में फोटोग्राफी बैन कर दी जाए, तो आधे से ज्यादा युवा डिप्रेशन में आ जाएंगे। उनके लिए वर्कआउट तब तक अधूरा है जब तक इंस्टाग्राम पर ‘बीस्ट मोड ऑन’ वाली स्टोरी न डल जाए। पसीना बाद में निकलता है, फोन का कैमरा पहले चमकता है। ये वो महानुभाव हैं जो जिम के अंदर तो ऐसे प्रोटीन शेक हिलाते हैं जैसे किसी लैब में वैक्सीन बना रहे हों। हर जिम में एक पुराना जिम जवैया दोस्त ‘गुरु’ जरूर होता है जिसने खुद कभी ढंग से स्क्वाट नहीं किया, लेकिन दूसरों को डाइट चार्ट ऐसे पकड़ाता है जैसे एम्स का डॉक्टर हो। हर साल 1 जनवरी को जिम मालिकों की लॉटरी लगती है। ‘न्यू ईयर रेजोल्यूशन’ वाले वीर, पूरे साल की फीस एक साथ जमा कर देते हैं। फिर केवल पहले चार दिन वे जिम में ऐसे नजर आते हैं जैसे मिल्खा सिंह के अवतार हों। मुझे लगता है कि दिखावाबाज़ों के लिए जिम जाना एक ‘पवित्र अनुष्ठान’ है। जैसे पुराने जमाने में लोग गंगा नहाकर खुद को धन्य मानते थे, वैसे ही ये लोग जिम की दहलीज छूकर और एक सेल्फी डालकर मान लेते हैं कि उन्होंने स्वास्थ्य का कोटा पूरा कर लिया। अब अगले 23 घंटे वे चाहे सोफे पर पड़े रहें या जंक फूड खाएं, उनका मन शांत रहता है क्योंकि उन्होंने दुनिया को दिखा दिया है कि वे ‘हेल्थ कॉन्शियस’ हैं।
इंजी. मधुर चितलांग्या
व्यंगकार व संपादक
पूरब टाइम्स


