एक मोहल्ले के बुजुर्ग क्रिकेट कप्तान को पता चल गया कि अब उनसे तेज गेंदें नहीं खेली जा रही हैं. उन्होंने समझदारी दिखाई और क्लब के अध्यक्ष बन गए, लेकिन शर्त यह रखी कि मेरा बेटा अब ओपनिंग करने आएगा और उसे आउट भी नहीं किया जाएगा. अमित शाह और नीतीश कुमार की यह जुगलबंदी इसी ‘फिक्स्ड मैच’ जैसी है, जहां हारने वाला भी मुस्कुरा रहा है क्योंकि उसे ‘मैन ऑफ द मैच’ का इनाम बैकडोर से मिल रहा है. नीतीश कुमार जानते हैं कि बिहार में ‘बड़ा भाई’ बने रहने के लिए अब उनमें वह पुरानी वाली फुर्ती नहीं बची. बीजेपी की बिछाई बिसात पर मोहरा बनने से बेहतर उन्होंने खुद को ‘किंगमेकर’ की ऊंचाइयों पर शिफ्ट कर लिया. इधर बीजेपी ने भी सोचा कि जब बिना युद्ध किए किला मिल रहा है, तो एक ‘राजकुमार’ की लॉन्चिंग की स्पॉन्सरशिप करने में क्या बुराई है? बिहार की राजनीति में ‘पलटू’ शब्द अब पुराना हो गया है, अब तो इसे ‘पॉलिटिकल टेलिपोर्टेशन’ कहना चाहिए. आरजेडी की परेशानी यह नहीं है कि नीतीश जा रहे हैं बल्कि वे जाते-जाते सत्ता की वह मलाई बीजेपी के कटोरे में डाल गए हैं, जबकि तेजस्वी ने अपनी पूरी युवावस्था नीतीश के, बीजेपी से अलग होते ही ‘खेला होबे’ की आस में बिता दी थी . विपक्षी नेता इस बात से हैरान हैं कि नीतीश कुमार ने ‘बिना रिटायरमेंट लिए रिटायरमेंट’ कैसे प्लान कर लिया? यह तो वही बात हुई कि परीक्षा हॉल में पर्चा कठिन आया तो नीतीश बाबू ने सप्लीमेंट्री कॉपी लेने के बजाय सीधे इनविजीलेटर की कुर्सी ही मांग ली . उधर चंद्रा बाबू भी इस वक़्त वारंटी पीरियड (गठबंधन की मजबूरी) में हैं , तब तक तो ठीक है, लेकिन जैसे ही सॉफ्टवेयर अपडेट (बीजेपी का अपना बहुमत) आएगा, पुराने मॉडल को ‘हैंग’ होना ही पड़ेगा. नायडू साहब को लग रहा है कि वे गेम के ‘को-ऑथर’ हैं, जबकि अमित शाह की लाइब्रेरी में उनका नाम ‘रेफरेंस बुक’ की तरह दर्ज है—जरूरत पड़ी तो पन्ने पलटेंगे, वरना धूल तो जमनी ही है.
इंजी. मधुर चितलांग्या
व्यंगकार व संपादक
दैनिक पूरब टाइम्स


