घर में सुबह उठकर जो लोग टमाटर की चटनी और ‘बासी’ (रात का बचा चावल) मजे से खाते हैं, वही दफ्तर पहुँचते ही अचानक ‘अंग्रेज’ हो जाते हैं। जैसे ही कोई किसान आकर अपनी बोली में कहता है— “साहब, मोर जमीन के कागज ल देख देते” (साहब, मेरे जमीन के कागज देख देते), तो साहब को अचानक छत्तीसगढ़ी समझ आना बंद हो जाता है। वे ऐसा चेहरा बनाते हैं मानो कोई परग्रही (एलियन) भाषा सुन रहे हों। जब कोई छत्तीसगढ़िया बुजुर्ग दफ्तर में “जय जोहार” या “राम राम” कहता है, तो साहब का ‘ईगो’ आहत हो जाता है। साहब को लगता है कि अगर उन्होंने ‘नमस्ते’ की जगह ‘जोहार’ जवाब दे दिया, तो उनके पढ़े-लिखे होने का प्रमाण पत्र रद्द हो जाएगा। सोशल मीडिया पर जितने लोग छत्तीसगढ़ी संस्कृति के फोटो डालते हैं और स्टेटस में “छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया” लिखते हैं , उसके आधे भी अगर दफ्तर में छत्तीसगढ़ी बोल दें, तो राजभाषा धन्य हो जाए। राजभाषा का दर्जा मिले सालों बीत गए, लेकिन दफ्तरों में आज भी ‘फाइल’ को छत्तीसगढ़ी की महक से डर लगता है। अनेक सालों के बाद भी अनेक साहबों को लगता है कि छत्तीसगढ़ी केवल गीत-संगीत और नाचा-गम्मत के लिए है, दफ्तर के ‘गंभीर’ कार्यों के लिए नहीं। इस बनावटी ‘गंभीरता’ ने भाषा को फाइलों से बाहर निकाल दिया है। फाइल साहब की मेज पर रेंगती है और भाषा कोने में रोती है। दफ्तर से निकलकर जब वे बाजार में ‘सब्जी’ खरीदने जाते हैं, तब तो अंग्रेजी काम नहीं आती, तब तो छत्तीसगढ़ी ही काम आती है न?
इंजी. मधुर चितलांग्या
व्यंगकार व सम्पादक
दैनिक पूरब टाइम्स


