मेरे इंजीनियरिंग कॉलेज का एक दोस्त मुझसे मिलने आया. पुरानी यादें ताज़ा हुईं , बेहद सुकून मिला. मित्रवर साईंबाबा का अनन्य भक्त था . वह शंकराचार्यजी से बेहद नाराज़ था. बोला, शंकराचार्य से ज़्यादा लोग साईंनाथ को मानने लगे हैं इसलिए उनकी जल गयी है. मैंने कहा, किसी भी आदमी में उसके संस्कार, अनुभूति या अनुभव से ही किसी के प्रति आस्था जागती है. सदगुरु साईंबाबा और जगतगुरु शंकराचार्य के अनुयायी इसी प्रकार के होंगे. मैंने, यह बात, पत्रकार माधो को बताई तो वे बोले, मैं आपको मशहूर संगीतकार एआर रहमान के जीवन की एक रोचक और महत्वपूर्ण कथा सुनाता हूं. वह 22 वर्षों तक हिंदू थे. एक दिन उनकी बहन बीमार पड़ी. उनके एक दोस्त ने उनकी बीमार बहन के लिए मस्जिद में दुआ मांगी. दुआ कबूल हुई. बहन ठीक हो गई और पूरे परिवार ने इस्लाम कबूल कर लिया. यह धर्म और आस्था परिवर्तन से ज्यादा इच्छाओं के पूरा होने का वाकया है. लोग अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए ईश्वर की भक्ति करते हैं. आदमी जो सोचता है, वह होता नहीं है और ईश्वर जो सोचता है, वही होता है. सवाल यह नहीं है कि लोगों को साईं की पूजा करनी चाहिए अथवा नहीं. बल्कि मूल प्रश्न है कि लोगों को ईश्वर की भक्ति करनी चाहिए अथवा नहीं. जिन लोगों की इच्छाओं की पूर्ति एक सिद्ध गुरु से नहीं हुई, वे साईं के पास जाएंगे ही और जिनकी इच्छाएं एक देव पूरी नहीं कर पाएंगे, वे महादेव के पास जाएंगे ही.लोगों को, इच्छाओं को पूरा करने वाले, पूजनीय चाहिए. आम लोगों की इच्छाएं होती भी क्या हैं? बेरोजगारी है, तो रोजगार मिल जाए. बीमारी है, तो बीमारी दूर हो जाए. गरीबी हो तो धन मिल जाए. जीवन सुखी और सुरक्षित हो. लेकिन ईश्वर को लोग ‘सुप्रीम कोर्ट’ मानते हैं जहाँ न्याय में देरी हो सकती है. इसलिए वे पहले ‘स्थानीय पंचायत’ (जीवित गुरु या स्थानीय सिद्ध स्थान) के पास जाते हैं कि शायद यहीं से ‘स्टे ऑर्डर’ मिल जाए और दुख रुक जाए. अंत में वे हंसते हुए बोले , “सबका मालिक एक है,” लेकिन उस मालिक के पास जाने वाले रास्तों में हमने अपनी ‘इच्छाओं के टोल टैक्स’ लगा दिए हैं. जो टोल कम ले और मंज़िल (स्वार्थ) तक जल्दी पहुँचा दे, वही गुरु आज सबसे ‘पॉपुलर’ है.
इंजी. मधुर चितलांग्या “माधो”
व्यंगकार व संपादक
दैनिक पूरब टाइम्स


