अथ श्री पेट्रोल किल्लत कथा ( काल्पनिक )

अमेरिका , इज़राइल व ईरान से शुरु हुए युद्ध ने पूरे विश्व में पेट्रोल के लिये हाहकार मचा दिया है . युद्ध को चलते हुए 185 दिन हो गये हैं. अब लोग पेट्रोल पंप पर तेल डलवाने नहीं, बल्कि बंद पम्प के मीटर पर बढ़ती ‘प्रति लीटर दर’ को ‘भावभीनी श्रद्धांजलि’ देने जाते हैं. सेल्समैन भी अब ‘कितने का डालूँ?’ नहीं पूछता, सीधा पूछता है ‘ केवल दर्शन करोगे या सेल्फी भी लोगे ?’ अमीरी दिखाने का नया तरीका अब महंगे परफ्यूम नहीं, बल्कि शरीर से आने वाली पेट्रोल की महक है. मेरे एक दोस्त ने बताया , “पार्टी में जाते वक्त मैंने रुमाल पर दो बूंद पेट्रोल छिड़क लिया. कसम से, पूरे मोहल्ले की लड़कियां ‘रईस-रईस’ कहकर पीछे हो लीं.” अब गूगल मैप्स सबसे छोटा रास्ता नहीं, बल्कि ‘सबसे कम पेट्रोल खर्च होने वाला’ रास्ता बताता है. वह कहता है— ‘आगे से दाहिने मुड़ें, वहां ढलान है, इंजन बंद कर लें, 2 पॉइंट पेट्रोल की बचत होगी.‘ गाड़ियां अब सड़क पर दौड़ने के लिए नहीं, बल्कि घर के बाहर शान बढ़ाने के लिए खड़ी की जाती हैं. जब भी मैं अपनी बाइक के पास से गुज़रता हूं , चेन की आवाज आती है— ‘भाई, कब तक पैदल चलोगे?’ यदि युद्ध ऐसे ही चलता रहा तो पुराने ग्रंथों में अमृत की जो बात होती थी, कलयुग में वह स्थान पेट्रोल ले लेगा. पेट्रोल की बढ़ती कीमत ने सबको मजबूरी में ‘पर्यावरण प्रेमी’ बना दिया है. मैं आजकल पैदल ऑफिस जाता हूं , लोग पूछते हैं ‘सेहत के लिए?’ मैं कहता हूं ‘नहीं भाई, पेट्रोल की किल्लत ने मुझे भी महात्मा गांधी बना दिया है. ’
इंजी. मधुर चितलांग्या
व्यंगकार व संपादक
दैनिक पूरब टाइम्स

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