एक विश्व स्तरीय कंपनी द्वारा , एआई के कारण 13000 कर्मचारियों की छंटनी से लोग डर रहे हैं कि देश में फैले बेरोज़गारी के आलम में एआई , और ज़्यादा बेरोज़गारी का समा ना बना दे . मैंने पत्रकार माधो से यह कहा तो वे मुस्कुराते हुए बोले , सरकार ने जीरामजी स्कीम में 125 दिन का काम दिया है, ताकि युवक मिट्टी खोदें और एआई से दूर रहें . उलट सरकार डरी हुई है कि अगर एआई ने बेरोजगार युवाओं से अकुशल श्रम सीख लिया, तो वह भी एक रुपये किलो चावल की लाइन में खड़ा हो जाएगा और ‘बेरोजगारी भत्ते’ के लिए सर्वर डाउन कर देगा. सरकार चाहती है कि युवा रील बनाकर अपनी मानसिक ऊर्जा नष्ट करे, ताकि एआई को कम से कम ‘प्रतिस्पर्धा’ मिले. अगर एआई ने ठुमके लगाना सीख लिया, तो इन युवाओं के पास तो ‘भत्ता’ मांगने का नैतिक अधिकार भी नहीं बचेगा. सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि एआई को ‘मानवीय’ होने से कैसे रोका जाए? क्योंकि ‘मानवीय’ होने का मतलब ही है—काम से जी चुराना और मुफ्त की रोटियां तोड़ना।
इंजी. मधुर चितलांग्या “माधो”
व्यंगकार व संपादक
दैनिक पूरब टाइम्स


