“उद्धव के ‘शिगुफे’ बनाम शिंदे की ‘शर्तें’: ‘मोलभाव’ ने बिगाड़ा फडणवीस का अंक गणित।”

राजनीति में ‘होटल’ अब सिर्फ ठहरने की जगह नहीं, बल्कि लोकतंत्र का ‘आईसीयू’ बन गए हैं। शिंदे जी के 29 पार्षद ताज लैंड्स एंड में इस तरह सुरक्षित हैं जैसे वे पार्षद नहीं, कोहिनूर हीरा हों। भाजपा 89 की ताकत दिखाकर सीना फुला रही है, पर शिंदे जी ने 29 की ‘चाबी’ से तिजोरी का ताला अटका दिया है। शर्त में मेयर ज़रूर होगा चाहे 5 साल का या फिर शुरु के 2.5 साल का . उद्धव गुट की शिवसेना फिलहाल उस दर्शक की भूमिका में है, जो मैच हारने के बाद पिच पर पत्थर फेंक कर मजे ले रहा है। कभी कहते हैं—’हम बैठक में नहीं आएंगे, ताकि शिंदे की जरूरत ही न पड़े।’ यह तो वही बात हुई कि हम खाना नहीं खाएंगे ताकि पड़ोसी का पेट खराब न हो। ठाकरे गुट को पता है कि उनकी अनुपस्थिति भाजपा की लॉटरी लगा देगी पर वे तो बस, शिंदे के ‘मोलभाव’ के गुब्बारे में सुई चुभाना चाहते हैं। राजनीति के इस सर्कस में जो खुद रिंग से बाहर है, वही संजय राउत सबसे ज्यादा ताल ठोक रहा है। मुझे तो बहुत मज़ा आ रहा है . आपको क्या सही लगता है ?
इंजी. मधुर चितलांग्या , संपादक , पूरब टाइम्स

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