इस खेल में सत्ता पक्ष कितनी भी ‘गलतियों’ पर उतर आए , विपक्ष फिर भी ‘सेल्फ गोल’ खायेगा ?

आजकल बीजेपी TINA फैक्टर यानी देयर इस नो आल्टरनेटिव (दूसरा विकल्प नहीं ) का मज़ा ले रही है . भाजपा के थिंक-टैंक को शायद ऐसा लगता है कि ब्राह्मण तो ‘फिक्स्ड डिपॉजिट’ हैं, वह कहीं नहीं जा सकता है . लेकिन कुमार विश्वास का “अभागा सवर्ण” वाला विलाप और यूजीसी के उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव रोकने से जुड़े नए नियमों की खिचड़ी ने इस डिपॉजिट में सेंध लगा दी है. वैसे भाजपा की एक कला काबिले-तारीफ है—’ट्रायल बलून’ छोड़ना. पहले एक विवादित नियम लाओ, हवा का रुख देखो, और अगर जनता का पारा 100 डिग्री पार करने लगे, तो उसे बड़ी चतुराई से ‘न्यायिक प्रक्रिया’ की गोद में डाल कर रुकवा दो. इधर यूपी में जब स्थानीय प्रशासन शंकराचार्य से उनकी प्रमाणिकता मांगता है, तो आम जनता इसे भी ‘ओवर कॉन्फिडेंस’ का चरम मानती है. लोग कह रहे हैं कि बिना ‘ऊपर’ के इशारे के स्थानीय बाबू की इतनी हिम्मत कहां ? परंतु इन सब बातों से, राहुल गांधी , अखिलेश यादव इत्यादि विपक्षीगण ज़्यादा खुश ना होवें क्योंकि यूपी में उनकी नींव जिस ज़मीन पर खड़ी‌ थीं वह तो कभी का पत्थर से रेत बन चुकी है . भाजपा इन सभी बातों से बेखौफ है क्योंकि जैसे ही चुनाव आते हैं , भाजपा का ‘क्लीनिंग ऑपरेशन’ शुरू हो जाता है. कुछ बड़े चेहरों की राजनीतिक बलि चढ़ा दी जाती है ताकि जनता को लगे कि “सिस्टम में खराबी थी, हमने पुर्जा ही बदल दिया.” यह एंटी-इन्कंबेंसी को मारने का सबसे नायाब तरीका है. आपकी क्या राय है ?
इंजी. मधुर चितलांग्या , संपादक , दैनिक पूरब टाइम्स

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