छत्तीसगढ़ी लोक नृत्य : राउत नाचा

दिवाली त्यौहार के अंत में माना जाता है कि भगवान जागृत अवस्था में आते है। और भगवान श्री कृष्ण की पूजा करने के लिए इस पवित्र नृत्य का प्रदर्शन करते हैं। भगवान कृष्ण गोपियों के साथ नृत्य करते है जिसे रास-लीला भी कहते है, इसी रास लीला का राउत नाचा के साथ अनुकरण करते है और इसे एक भक्तिपूर्ण प्रदर्शन माना जाता है।

आमतौर पर नृत्य के साथ गए जाने वाले दोहो में आदिवासी जीवन शैली का वर्णन किया जाता है। जनजातीय दर्शन और उनके आदर्श संगीत और गीतों का जो प्रतिबिंबित होता हैं वह दर्शको को मंत्रमुग्ध करके दूसरी दुनिया में ले जाता हैं। इसमें संगीत की विविधता हैं। सांस्कृतिक प्रदर्शनों में प्रमुख संगीत वाद्ययंत्र मांदर, ढोल और ड्रम हैं। दिवाली त्योहार के सात दिनों के लिए बेहद कल्पनाशील और निपुण नाटक रावत नाचा मनोरंजन का एक लोकप्रिय रूप है। यह नृत्य और संगीत के रूप में विविध महाभारत कालीन युद्ध की कहानियों को एक अनोखे ढंग से चित्रित करता है। साथ ही कवि कबीर और तुलसी की छंद छत्तीसगढ़ के प्रागैतिहासिक आदिवासी समुदायों के मध्य में प्राचीन काल के स्मृति से भर देती है।

राउत नाचा भगवान कृष्ण के साथ गोपी के नृत्य के समान है। समूह के कुछ सदस्यों द्वारा गीत गाया जाता है, कुछ वाद्ययंत्र बजाते है और कुछ सदस्य चमकीले और रंगीन कपड़े पहनकर नृत्य करते हैं।  नृत्य आमतौर पर समूहों में किया जाता है। नर्तक हाथो में रंगीन सजी हुयी छड़ी और धातु के ढाल के साथ और अपनी कमर और टखनों में घुंघरू बांधते है। वे इस नृत्य में बहादुर योद्धाओं का सम्मान करते हुए प्राचीन लड़ाइयों और बुराई पर अच्छाई की अनन्त विजय के बारे में बताते हैं। नृत्य राजा कंस और भगवान कृष्ण के बीच पौराणिक लड़ाई का प्रतिनिधित्व करता है और जीत का जश्न मनाया। और शाम को कई गांवो में मातर मढ़ई का आयोजन किया जाता है।

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