सुप्रीम कोर्ट:कोई महिला आजीविका के लिए वेश्यावृत्ति करे तो अपराधी नहीं माना जा सकता

उच्चतम न्यायालय ने देह व्यापार, मानव तस्करी और वयस्क यौनकर्मियों के अधिकारों को लेकर एक ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि हर मामले को एक ही नजरिये से नहीं देखा जा सकता।

अदालत ने अनैतिक देह व्यापार निवारण अधिनियम के तहत चल रही कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि स्वेच्छा से देह व्यापार करने वाली वयस्क महिलाओं, तस्करी का शिकार महिलाओं और दबाव या हिंसा के कारण इस दलदल में धकेली गई महिलाओं को एक ही श्रेणी में रखकर देखना अन्यायपूर्ण है। न्यायालय ने यह भी कहा कि किसी महिला को केवल इसलिए अपराधी नहीं माना जा सकता क्योंकि वह देह व्यापार से जुड़ी हुई है।

न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का उपयोग करते हुए एक विस्तृत “पीड़ित संरक्षण योजना” जारी की है। इस योजना में मानव गरिमा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों को केंद्र में रखा गया है।

अदालत ने साफ कहा कि “यौनकर्मियों के अधिकार हो सकते हैं, भले ही देह व्यापार करने का कोई मौलिक अधिकार न हो।” यह टिप्पणी भारतीय न्याय व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देती है, जहां पहली बार व्यक्तिगत इच्छा और स्वायत्तता को इतनी स्पष्टता से स्वीकार किया गया है।

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