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संपादकीय : हर घर तिरंगा पर एक विचार : ना खुदा ही मिला ना विसाले सनम ,ना इधर के रहे ना उधर के रहे 


वे काफी बूढ़े थे . कुछ ज़्यादा ही सादी वेशभूषा में थे. गांधीजी के जैसा गोल रिम वाला ऐनक लगा रखा था. ऑफ़िस आकर उन्होंने मुझसे मिलने का समय मांगा. इंटरकॉम में पहले मैंने एक अपरिचित के लिये कह दिया कि बहुत व्यस्त हूं. क्यों आये हैं ? क्या काम है ? मुझे बताया गया कि वे मुझसे कुछ चर्चा करने आये हैं ? मैंने  झल्लाते हुए कहा कि सिर्फ पांच मिनट में अपनी बात कहने बोल देना .  वे बड़े कायदे से कमरे के अंदर दाखिल हुए और मुझसे क्षमा मांगते हुए बोले , मुझे माफ करियेगा , मुझे पता है कि आप बहुत बिज़ी रहते होंगे . पर मैं आपके लेख नियमित रूप से पढ़ता हूं . आपसे एक रिश्ता सा जुड़ गया है . इसलिये अपनी बात कहने की हिम्मत जुटा रहा हूं . मुझे क्षमा करेंगे . अब मैं भी शिष्ट होते हुए बोला , कहिये क्या कहना चाहते हैं पर हम आज अपनी बात जल्दी समाप्त कर देंगे . वे चेहरे पर मुस्कान लाते हुए बोले, मुझे आपके लेख , व्यंग , कटाक्ष और कार्टून बहुत अच्छे लगते हैं क्योंकि उनमें एक संदेश होता है . इस बार देश भक्ति के मामले में बहुत अच्छी बातें लिखीं पर कोई स्पष्ट संदेश नहीं दिया. मैंने थोड़ा ज़्यादा इंट्रेस्ट दिखाते हुए कहा , यदि आप कोई ऐसी बात कहें जो मेर दिल को छू लेगी तो मैं आपकी बात को भी अवश्य छापूंगा . उनकी बातों ने सचमुच मुझे हैरान कर दिया . वे बोले , देश
स्वतंत्र होने के अंतिम वर्षों में  सभी देश वासियों के सामने केवल एक ही लक्ष्य था कि देश को आज़ादी कैसे मिले ? कितने ही अमीर इस कार्य के लिये जेल गये , कितने ही व्यापारियों का आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लेने से व्यापार बरबाद हो गया , कितने ही लोगों के हिस्से में सुखी पारिवारिक जीवन नहीं आया . यदि कोई भी वर्ग किसी भी प्रकार की कोताही करता तो आज़ादी मिलती ही नहीं . अर्थात या तो पूर्ण आज़ादी या गुलामी बरकरार . मैंने पूछा , इसका क्या आशय है ? उन्होंने कहा , यदि तिरंगा यात्रा व हर घर तिरंगा से देश भक्ति  बढ़ती है और देश की तरक़्क़ी होती है तो इससे अच्छा कोई उपाय नहीं है. पर यदि आप देश में वास्तविक आर्थिक आज़ादी लाना चाहते हैं , उसमें सबसे पहले सरकारी कर्मचारी , नेतागण व मीडिया , पूरी ईमानदारी , संपूर्ण समर्पण व नुकसान सहने की इच्छा शक्ति के साथ आगे कदम बढ़ाएंगे तो ही यह बड़ा कदम सफलता का कदम बनेगा . पर यदि आधे मन से , अनमने पन
से , या केवल उड़ाऊ  बातचीत से आप सब इस मामले में सहयोग करेंगे तो यह 1857 की क्रांति की तरह हो जायेगा और भाईनरेंद्र मोदी भी मंगल पाण्डे की तरह इतिहास के पन्नों में अमर हो जायेंगे . उनकी
बातों ने मुझे हिला कर रख दिया है . आप भी ज़रूर विचार करियेगा . 

इंजी. मधुर चितलांग्या ,संपादक,
दैनिक पूरब टाइम्स 

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