जहाँ से कहानियाँ उठती हैं, वहीं से सिनेमा को रास्ता मिलता है

रायपुर साहित्य उत्सव में सत्यजीत दुबे

रायपुर। रायपुर साहित्य उत्सव में “नई पीढ़ी की फिल्मी दुनिया” पर हुई बातचीत किसी औपचारिक पैनल जैसी नहीं लगी। मंच पर बैठे अभिनेता सत्यजीत दुबे की बातों में अनुभव था, ठहराव था और सिनेमा को देखने का एक साफ़, ज़मीनी नज़रिया था। श्यामलाल चतुर्वेदी मंडप में जैसे ही उन्होंने बोलना शुरू किया, यह स्पष्ट हो गया कि यह चर्चा फिल्मों से आगे जाकर कहानियों, संवेदना और समाज की बात करने वाली है। सत्यजीत दुबे के लिए सिनेमा चमक-दमक का खेल नहीं है। उनके शब्दों में, फिल्म की उम्र बजट तय नहीं करता, उसकी सच्चाई तय करती है। जो कहानी दिल तक पहुंचती है, वही समय के साथ चलती है।

सत्यजीत ने छत्तीसगढ़ की धरती का ज़िक्र करते हुए कहा कि यहां का लोकजीवन, साहित्य और सामाजिक अनुभव भारतीय सिनेमा के लिए वह आधार हैं, जिन पर टिकाऊ और यादगार फिल्में बन सकती हैं। “कहानियां हमारे चारों ओर हैं,” वे कहते हैं, उन्हें बस देखने और ईमानदारी से कहने की ज़रूरत है। डिजिटल दौर पर उनकी बात किसी ट्रेंड का दोहराव नहीं थी, बल्कि एक संभावना का संकेत थी। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को उन्होंने क्षेत्रीय अनुभवों की आवाज़ बताया कि ऐसी आवाज़, जो अब सीमाओं में नहीं बंधी। आज का दर्शक सच्ची, ज़मीन से जुड़ी कहानियां चाहता है। उसे परफेक्ट चेहरे नहीं, असली इंसान देखने हैं, सत्यजीत दुबे ने कहा।

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