बदलते दौर में जहाँ केमिकल युक्त सौंदर्य प्रसाधनों का बाज़ार लगातार बढ़ रहा है, वहीं तेलंगाना के आदिवासी वनांचलों से एक शांत लेकिन बेहद महत्वपूर्ण आर्थिक बदलाव की कहानी सामने आ रही है. राज्य के मुुलुगु, भद्राद्री कोठागुडेम और खम्मम के घने जंगलों से स्थानीय समुदायों द्वारा खोजी जाने वाली शिकाकाई की फलियाँ अब केवल ग्रामीण हाट-बाज़ारों तक सीमित नहीं हैं. यह पारंपरिक और प्राकृतिक क्लींजर अब हैदराबाद के बड़े थोक बाज़ारों और आधुनिक ऑर्गनिक आउटलेट्स में शहरी उपभोक्ताओं की पहली पसंद बन चुका है. इससे सुदूर क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों को एक बड़ा आर्थिक संबल मिल रहा है और उनकी आजीविका में सुधार हो रहा है.
कोया और लम्बडा समुदाय के लोग पीढ़ियों से सर्दियों के अंत और गर्मियों की शुरुआत में वनों से इन प्राकृतिक फलियों को इकट्ठा करते हैं. आदिवासी महिला रूपा कुडियम बताती हैं कि जंगलों से इन कटीली फलियों को बीनना बेहद कठिन काम होता है. इन्हें बीनने के बाद धूप में अच्छी तरह सुखाया जाता है और बांस की बड़ी-बड़ी पारंपरिक टोकरियों में भरकर स्थानीय साप्ताहिक बाज़ारो में बिक्री के लिए लाया जाता है. यह वन उपज इन आदिवासी परिवारों के लिए केवल एक जड़ी-बूटी नहीं है, बल्कि एक महत्वपूर्ण मौसमी आजीविका का जरिया है, जो उनकी संस्कृति का भी हिस्सा है.
ग्रामीण हाट से हैदराबाद तक बदल जाता है मुनाफे का गणित
जंगलों से चुनी गई यह शिकाकाई जब ग्रामीण हाट से निकलकर हैदराबाद के महानगर तक पहुँचती है, तो इसके व्यापार और मुनाफे का समीकरण पूरी तरह बदल जाता है. स्थानीय आदिवासी बाज़ारों में जो शिकाकाई 40 से 60 रुपए प्रति किलो के थोक भाव पर बिकती है, वही हैदराबाद के बेगम बाज़ार या मोअज्जम जाही मार्केट जैसी थोक मंडियों में पहुँचकर 90 से 130 रुपए प्रति किलो तक हो जाती है. इसके बाद, जब इसे प्रोसेस करके बड़े शहरों के आधुनिक ऑर्गनिक स्टोर्स में आकर्षक पैकिंग के साथ बेचा जाता है, तो इसकी कीमत 300 से 500 रुपए प्रति किलो तक पहुँच जाती है.


