कछुए और खरगोश की कहानी हम बचपन से सुनते आये हैं परन्तु मुझे एक मैनेजमेंट गुरु ने नई तरह से वह कहानी बताई थी . कछुए और खरगोश की कहानी में खरगोश ने कछुए को फिर से चैलेंज किया . कछुए ने कहा कि दिन और रास्ता मैं तय करूंगा . ओवर कॉन्फिडेंस में खरगोश ने हां कह दिया . तय दिन में खरगोश बिना सोये तेज़ी से दौड़ा और बहुत आगे निकल गया . परन्तु यह क्या ? आगे चलकर एक जगह पर सड़क के ऊपर तेज़ी से पानी बह रहा था . खरगोश ने पहले ध्यान नहीं दिया था और चतुराई से कछुए ने बारिश के मौसम में रेस रखी थी . बह जाने के डर से खरगोश पानी में नहीं उतरा . कछुआ धीरे धीरे चलते आया और पानी में तैरकर रेस जीत गया . कहने का मतलब यह है कि चतुराई से भी बलवान शत्रु को हराया जा सकता है .
मैंने पत्रकार माधो को यह कहानी सुनाई तो वह मुस्कुराते हुए बोले , चलो, मैं तुम्हें और मैनेजमेंट गुरुओं के लिए इस कहानी का राजनैतिक वर्ज़न सुनता हूं . हारने के बावजूद खरगोश ने उस दौड़ के परिणाम पर ऑब्जेक्शन लगा दिया . फिर टाइम कीपर को घूस खिलाकर उस दौड़ को अवैध घोषित करवा दिया कि कई नियमों की अवहेलना की गयी थी . अगली गर्मी फिर से रेस हुई , खरगोश पूरी ताक़त से दौड़ा पर उसने देखा कि कछुआ पहले से ही फिनिशिंग लाइन पर जीप से उतर रहा है और उसे जीता घोषित कर दिया गया . मालूम चला कि कछुआ के पिता इस बार चुनाव जीतकर विधायक बन गए हैं. दूसरी सुबह खरगोश ना जाने कैसे गायब हो गया . इस तरह से कछुआ हमेशा के लिए खरगोश से जीत गया . फिर हंसते हुए पत्रकार माधो बोले , आज के समय जो युक्ति से भी नहीं हारता उसे राजनीति से हराया जा सकता है .
इंजी. मधुर चितलांग्या ‘माधो’, संपादक, पूरब टाइम्स


