छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों ‘सेवा और अनुशासन’ के प्रतीक स्काउट-गाइड के झंडे तले एक अनोखा ‘दंगल’ देखने को मिल रहा है। एक तरफ वर्तमान शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव हैं, जिन्हें ‘वर्तमान’ अध्यक्ष बताया जा रहा है, तो दूसरी तरफ पूर्व अध्यक्ष व सांसद, अनुभवी बृजमोहन अग्रवाल हैं, जो ‘अनियमितताओं’ की सीटी बजाकर खेल रोकने की कोशिश कर रहे हैं। यह दृश्य किसी जंबूरी से अधिक ‘कुर्सी-दौड़’ जैसा प्रतीत हो रहा है। कमाल की बात यह है कि जिस संस्था का मूल मंत्र ‘तैयार रहो’ है, वहां दिग्गज नेता एक-दूसरे को ‘अशक्त’ करने के लिए तैयार बैठे हैं. पूर्व अध्यक्ष की परिषद ने कहा—”रद्द करो”, पर शिक्षा विभाग ने कहा—”आयोजित करो”। अब इस खींचतान के बीच बेचारे रोवर-रेंजर यह समझ नहीं पा रहे कि उन्हें गांठ रस्सी में लगानी है या राजनेताओं को अपनी ही पार्टी के रिश्तों में ? लगता है , इस जंबूरी में अनुशासन की नहीं, बल्कि राजनीति की ‘कठिन परीक्षा’ चल रही है या फिर पूर्व मंत्री ताक़तवर बृजमोहन अग्रवाल को राज्य की राजनीति से शून्य करने के लिये प्रदेश सरकार ने कमर कस ली है जिसे उन्हें अनदेखा नहीं करना चाहिये . आपकी क्या राय है ?
इंजी. मधुर चितलांग्या , संपादक , दैनिक पूरब टाइम्स


