छत्तीसगढ़ की फिजाओं में प्रदूषण अब ‘प्रसाद’ की तरह बंट रहा है, जो नंगी आंखों से साफ दिखता है, बस विभाग की फाइलों में नजर नहीं आता। दरअसल, पर्यावरण संरक्षण विभाग के दफ्तरों में एक विशेष ‘जादुई चश्मा’ इस्तेमाल होता है, जिसे पहनते ही जहरीला धुआं ‘शुद्ध ऑक्सीजन’ और सड़कों पर बिखरा कचरा ‘लैंडस्केपिंग’ नजर आने लगता है। जब अधिकारी अपनी वातानुकूलित (AC) कारों के काले शीशे चढ़ाकर निकलते हैं, तो उन्हें बाहर की धूल भी ‘सिल्वर डस्ट’ जैसी लगती है। सालाना रिपोर्ट के आंकड़े इतने व्यवस्थित होते हैं कि मानो फैक्ट्रियां धुआं नहीं, इत्र उगल रही हों। नंगे पांव चलने वाले मजदूर की आंखों में जो किरकिराहट और धुएं का दर्द है, वह एयर-कंडीशनर की ठंडक में बैठे इन ‘आंकड़ा-विशेषज्ञों’ को कैसे महसूस होगा ? साहबों की (मैडमों की भी) मेज पर विकास की फाइलें तो चमक रही हैं, बस आम आदमी का दम घुट रहा है। सोने पर सुहागा, विभाग के जन संपर्क अधिकारी हैं जोकि किसी भी मामले का जवाब नहीं देते . आप ही बताइये कि क्या ऊपर वालों के अंध संरक्षण के बिना यह सब संभव है ?
इंजी. मधुर चितलांग्या , संपादक , दैनिक पूरब टाइम्स


