भारतीय राजनीति में कांग्रेस के राहुल गांधी उस ‘अक्षय पात्र’ की तरह हैं, जिससे विपक्ष को ऊर्जा और गठबंधन को सिरदर्द मिलता है। कांग्रेस गठबंधन की वह धुरी हैं जिस पर पहिया टिकना तो चाहता है, पर धुरी खुद ही अचानक विदेश घूमने चली जाती है। राहुल गांधी का व्यक्तित्व वह पहेली है जिसे हल करने की कोशिश में सहयोगी दल बूढ़े हो रहे हैं, जबकि सत्तापक्ष उनकी ‘लंबी पारी’ के लिए मंदिरों में विशेष अनुष्ठान करवाता है। गठबंधन के लिए वे मजबूरी हैं लेकिन भाजपा के लिए जरूरी हैं । जब वे खुल कर बोलते हैं, तो अपनी पार्टी को ‘मौन’ की दुआ मांगनी पड़ती है और विपक्ष को ‘हेडलाइंस’ मिल जाती हैं। वे राजनीति के वह इकलौते सेनापति हैं, जिनके मैदान में डटे रहने की सबसे ज्यादा मन्नतें दुश्मन खेमे में मांगी जाती हैं। आपकी इस पर क्या टिप्पणी है ?
इंजी. मधुर चितलांग्या , संपादक , दैनिक पूरब टाइम्स


