लोकतंत्र के इस सर्कस में अब ‘विक्टिम कार्ड’ ही सबसे बड़ा इक्का है। इधर ईडी सबूतों की पोटली ढूंढ रही है, उधर ममता दीदी ने दिल्ली के ‘चाणक्य’ और ‘वित्त-विद्वान’ पर साजिश की मुहर लगा दी है। दीदी जानती हैं कि जांच में सहयोग करना तो उबाऊ है, असली मजा तो ‘गिरफ्तारी’ के ड्रामे में है। अगर सलाखें करीब आईं, तो बंगाल की सड़कों पर ‘मां-माटी-मानुष’ के आंसुओं का सैलाब उमड़ेगा। आखिर जनता को विकास से ज्यादा ‘शहीद’ हुए नेता पर प्यार आता है। सबूतों को बचाना तो बहाना है, असली मकसद तो जेल की दहलीज को सत्ता की सीढ़ी बनाना है। जब तक आप ‘पीड़ित’ नहीं, तब तक आप ‘लोकप्रिय’ नहीं! इस बारे में आपकी क्या राय है ?
इंजी. मधुर चितलांग्या , संपादक , दैनिक पूरब टाइम्स


