अब तक हमने ई-कॉमर्स साइट्स पर ‘7 डेज रिटर्न पॉलिसी’ देखी थी, लेकिन तेलंगाना में निकाय चुनाव के उम्मीदवारों ने इसे राजनीति में लागू कर दिया है. हारने वाले उम्मीदवार अब वोटरों के दरवाजे पर ‘रिकवरी एजेंट’ बनकर खड़े हैं. अब वोटर को समझ आ गया है कि चुनावी नोट कोई ‘गिफ्ट’ नहीं, बल्कि एक ‘कंडीशनल लोन’ था . हारते ही उन्होंने मतदाताओं को याद दिला दिया कि—”भैया, हमने निवेश किया था, समाज सेवा नहीं.” वैसे चुनाव के समय, चुनाव आयोग तो ऐसे बैठ जाता है जैसे मोहल्ले की वो बुज़ुर्ग दादी, जिन्हें सब पता है कि कौन क्या बांट रहा है, पर वो बस चश्मा ठीक करके कहती हैं—”बच्चे हैं, खेल रहे हैं.” मुझे लगता है कि इस “तेलंगाना कंसेप्ट” को आगे बढ़ाने से धीरे धीरे, पैसा बांटने वाला व चतुराई से पैसे लेने वाला , अपनी चालकियां बंद कर देगा . सबसे पहले चुनाव आयोग एक विशेष ‘सत्यवादिता शपथ’ भरवाये जिसमें उम्मीदवार लिखकर दे कि “अगर मैंने एक कप चाय भी पिलाई, तो मेरा चुनाव शून्य माना जाए. साथ ही वह वोटरों से भी साफ कर दे कि उनका पैसा कोई ‘दान’ नहीं, बल्कि ‘सिक्योरिटी डिपॉजिट’ है . अब वोटरों को भी गिफ्ट लेते समय ‘रसीद’ और ‘वारंटी कार्ड’ संभाल कर रखना होगा. चतुर भारतीय वोटर ,एक से साड़ी लेता है, दूसरे से पैसे और वोट तीसरे को देता है. लेकिन इस ‘रिकवरी ट्रेंड’ से उसे डर रहेगा कि अगर ‘साड़ी वाले’ को वोट नहीं दिया और वह हार गया, तो वह बीच सड़क पर साड़ी वापस मांग लेगा. ऐसे चुनाव में मज़ा बहुत आयेगा , उम्मीदवार अपनी खूबियां बताने के बजाय दूसरे की जेब में चुपके से 500 का नोट डालने की फिराक में रहेगा ताकि उसकी सदस्यता रद्द करवा सके. राजनीति में ‘स्टिंग ऑपरेशन’ ही मुख्य गेम प्लान बन जाएगा. उम्मीदवार पैसे बांटने की बजाय विरोधी के लिये ‘स्पाई कैमरे’ लेकर घूमेगा. फिर एक दिन ऐसा आयेगा कि उम्मेदवार पैसे बांटने से डरेगा , वोटर पैसे लेने से डरेगा . बस , इसी प्रकार से सत्ता पक्ष को भी चुनाव के पहले मुफ्त रेवड़ी बांटने/ घोषणा करने, से रोकने के लिये भी चुनाव आयोग व सुप्रीम कोर्ट को कोई धांसू उपाय सोचना होगा . आपको कोई उपाय सूझता है तो ज़रूर बताइये .
इंजी. मधुर चितलांग्या , संपादक , पूरब टाइम्स


