हमारा एक साथी कह रहा था कि गरीब में नैतिकता और ईमानदारी ज़्यादा होती है . तो हमारे दूसरे साथी ने कहा ,अगर कोई आदमी भूखा रहेगा , तो ईमानदार कैसे रहेगा ? आप तीन दिन से भूखे आदमी को जलेबी की रखवाली करने की ज़िम्मेदारी दें . पहले वह नैतिकता वश ईमानदार रहेगा . फिर बाहरी लोग क्या कहेंगे के चक्कर में , खुद जीभ को होठों पर फिराने के बावजूद भूख से लड़ेगा. फिर मन में खुद से कहेगा , ऐसी की तैसी ईमानदारी की . ईमानदार होकर भूखे मरने से अच्छा है कि बेइमान होकर ज़िंदा तो बचें. तीसरे साथी ने कहा , इसका मतलब सबसे ज़्यादा ईमानदार एकदम उच्च स्तर पर पहुंचे नेता, धनपति या नौकरी पेशा में होनी चाहिये . इस पर दूसरे ने फिर से कहा , उनकी तो हालत और ज़्यादा खराब है . सरकार से जितनी बेइमानी हज़ारों गरीब पूरी ज़िंदगी में नहीं करते हैं , उससे ज़्यादा वे एक डील में कर लेते हैं . मैंने भी चर्चा में हिस्सा लेते हुए कहा कि फिर हमें समझ लेना चाहिये कि हमारे देश में ईमानदारी का ठेका हम मध्यम वर्गियों ने ले रखा है . अब पत्रकार माधो बोले , यह सच है कि बचपन में सभी अपने बच्चों को ईमानदारी का पाठ पढ़ाते हैं . पर जब वही बच्चा बड़ा हो जाता है तो हम ही उसे टैक्स चोरी, सरकारी स्कीमों से कैसे अतिरिक्त लाभ उठायें , ज़्यादा ईमानदारी से नुकसान आदि सिखाते हैं . वह केवल सुनता ही नहीं बल्कि लोगों को अपने आचरण मे यह सब लाते देखता है. ऐसे में उसकी नैतिकता कमज़ोर हो जाती है . मेरा कहने का मतलब यह है कि चाहे गरीब हो, मध्यमवर्गीय हो या अमीर हो वे अपनी अपनी ज़रूरत और स्तर के हिसाब से अपनी ईमानदारी छोड़ देते हैं . मैंने पूछ लिया, फिर हमारे छत्तीसगढ़ में ईमानदारी फैलाने का ज़िम्मा किसका है ? पत्रकार माधो बोले , आपका है ,हमारा है , हम सबका है . वैसे ईमानदारी की शुरुआत और बढ़त , ऐसे लोगों के आचरण से ज़्यादा असरकारक होता जिनका लोग अनुसरण करते हैं . जैसे मां- बाप , शिक्षक , लीडर और फिर सबसे अधिक सरकार . मेरा एक साथी बोला, मां-बाप और शिक्षक की दखल -अंदाज़ी एक उम्र के बाद खत्म हो जाती है . ऐसे में क्या हमें , छत्तीसगढ़ के नेताओं , शासकीय अधिकारियों और प्रदेश सरकार से प्रेरणा लेनी चाहिये ? पत्रकार माधो ने इस अप्रिय सवाल से बुचकते हुई ,यह सवाल आप पाठकों की तरफ उछाल दिया . अब आप लोग ही बतायें , आपकी क्या राय है ?
इंजी. मधुर चितलांग्या , संपादक , पूरब टाईम्स


