सुप्रीम कोर्ट ने कहा -शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना हर नागरिक का मौलिक और संवैधानिक अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को फिर कहा कि शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार एक संवैधानिक गारंटी है जिसे कम नहीं किया जा सकता। साथ ही, कोर्ट ने संकेत दिया कि वह देश भर में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के लिए एक समान नियम बना सकता है। शीर्ष अदालत ने कहा कि नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध का पूरा अधिकार है, लेकिन अधिकारियों के पास ऐसे जमावड़ों में बाधा डालने की कोशिश करने वाले असामाजिक तत्वों से निपटने के लिए एक स्पष्ट तरीका भी होना चाहिए। ये टिप्पणियां उन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की गईं जिनमें NEET-UG पेपर लीक और शिक्षा व परीक्षा प्रणाली में अन्य गड़बड़ियों को लेकर विरोध कर रहे छात्रों के खिलाफ पुलिस की ज्यादतियों का आरोप लगाया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने पूरे देश में विरोध-प्रदर्शन के लिए गाइडलाइंस बनाने का संकेत दिया

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने कहा कि इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर विचार करने की ज़रूरत है। उन्होंने सुझाव दिया कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शनों के लिए एक स्टैंडर्ड प्रोटोकॉल नागरिकों के अधिकारों और कानून-व्यवस्था की चिंताओं के बीच संतुलन बनाने में मदद कर सकता है। सुनवाई के दौरान, सीजेआई ने कहा कि जब कोई शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करना चाहता है, तो इसके लिए एक प्रोटोकॉल होना चाहिए। इसके लिए सही जगह होनी चाहिए।

इस मामले में कोई रुकावट नहीं है। लेकिन अगर कोई असामाजिक तत्व है, तो उससे निपटा जा सकता है। अगर कोई ज्यादती होती है, तो उसकी स्वतंत्र रूप से जांच होनी चाहिए। यह सिर्फ़ दिल्ली का मामला नहीं है। प्रोटोकॉल में एकरूपता ज़रूरी है। सिर्फ़ इसलिए कि विरोध हो रहा है, इसका मतलब लाठी-चार्ज नहीं है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अनुशासन ज़रूरी है।

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