पश्चिम बंगाल में पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस अपने गठन के बाद के सबसे गंभीर संकट से गुजर रही है। पार्टी के भीतर पहली बार खुला विभाजन सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस के कुल अस्सी विधायकों में से 58 विधायकों के एक बड़े समूह ने ममता बनर्जी की पसंद के खिलाफ जाकर ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता चुन लिया। वर्ष 1998 में स्थापित पार्टी में यह पहला बड़ा विभाजन माना जा रहा है। माना जा रहा है कि यह असंतोष केवल नेतृत्व शैली तक सीमित नहीं है, बल्कि ममता बनर्जी के राजनीतिक उत्तराधिकारी माने जा रहे उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव को लेकर भी नाराजगी गहराती जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस घटनाक्रम का असर केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रहेगा। लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के 28 और राज्यसभा में 13 सांसद हैं। अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या पार्टी अपने सांसदों को एकजुट रख पाएगी या फिर बंगाल में विधायकों की तरह दिल्ली में सांसदों में भी टूट देखने को मिल सकती है। पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर चुप्पी साध रखी है, लेकिन अंदरखाने चिंता गहरी बताई जा रही है। एक वरिष्ठ नेता ने स्वीकार किया कि इस समय पार्टी के लिए सबसे महत्वपूर्ण चुनौती संसद और उसके बाहर अपने सांसदों को एकजुट बनाए रखना है।
इस बीच विपक्षी दलों के गठबंधन के भीतर भी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। लोकसभा में सरकार के संवैधानिक संशोधन विधेयक को रोकने में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और द्रविड मुनेत्र कषगम की साझा रणनीति निर्णायक रही थी। इन दलों के कुल 185 सांसदों ने सदन की एक तिहाई से अधिक संख्या जुटाकर सरकार की राह रोकी थी। लेकिन अब तृणमूल कांग्रेस के भीतर संकट और तमिलनाडु में बदलते राजनीतिक समीकरणों ने विपक्षी एकता को कमजोर कर दिया है।


