तमिलनाडु में डीएमके, एआईएडीएमके, कांग्रेस और भाजपा ने ब्राह्मण को टिकट क्यों नहीं दिया ?

तमिलनाडु की चुनावी सरगर्मी के बीच एक ऐसा तथ्य सामने आया है जिसने पूरी राजनीतिक बहस को झकझोर दिया है। हम आपको बता दें कि राज्य की प्रमुख पार्टियों डीएमके, एआईएडीएमके, कांग्रेस और यहां तक कि भाजपा ने इस बार एक भी ब्राह्मण उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा। दरअसल यह कोई चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि उस गहरी राजनीतिक और सामाजिक सोच का नतीजा है जिसने पिछले सौ वर्षों में तमिलनाडु की सत्ता की परिभाषा ही बदल दी है।

यह कहानी तमिलनाडु की सत्ता से ब्राह्मण समुदाय के गायब होने की नहीं है, बल्कि उसकी भूमिका के बदल जाने की है। हम आपको बता दें कि ब्राह्मण तमिलनाडु में आज भी नौकरशाही, नीति निर्माण, विचारधारा और प्रभावशाली नेटवर्क में मजबूती से मौजूद हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब वह चुनावी मंच पर नजर नहीं आते, बल्कि पर्दे के पीछे से खेल को दिशा देते हैं। यानी चेहरा नहीं, सिस्टम बन गए हैं।

इस बदलाव की जड़ें ढूँढ़ने के लिए इतिहास के पन्नों को पलटना होगा। हम आपको याद दिला दें कि 1916 का गैर ब्राह्मण घोषणापत्र इस पूरे परिवर्तन की शुरुआत था। उस दौर में ब्राह्मण आबादी में बेहद कम थे, लेकिन शिक्षा, सरकारी नौकरियों और प्रशासन में उनका दबदबा असाधारण था। अंग्रेजी भाषा उनकी सबसे बड़ी ताकत थी, जिसने उन्हें सत्ता के करीब पहुंचाया। यही असंतुलन धीरे-धीरे असंतोष में बदला और फिर एक मजबूत राजनीतिक पहचान में ढल गया यानि गैर ब्राह्मण।

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