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Sunday, April 12, 2026
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नया रायपुर डेवेलपमेंट ऑथोरिटी- भाग -1  छत्तीसगढ़ में भी किसानों को … विस्थापन का दंश व्यथित कर रहा है , समझे ?

पूरब टाइम्स , रायपुर . छत्तीसगढ़ , के नये राज्य बनते ही साथ , एक परिकल्पना , उच्च स्तरीय निर्णय लेने वालों के ज़ेहन में तैर गई थी कि इसकी नई राजधानी का विकास ऐसा हो जोकि    बाहरी लोगों के लिये देखने , सुनने , व स्थानीय लोगों के लिये  रहने व उपयोगिता के लिये अद्वितीय हो . इस उद्देश्य से मास्टर प्लान बनाया गया व ज़मीनों की आवश्यकता का आंकल्न कर , उसे अधिग्रहित किया गया . पैसों व संसाधन की कोई कमी नहीं थी क्योंकि स्वयं राज्य सरकार तन, मन व धन से इस प्रोजेक्ट को हक़ीक़त  में बदलने लगी थी . फिर क्या हुआ , आज लगभग 15 साल विलंब होने के बाद भी यह प्रोजेक्ट , पूरी हक़ीक़त में नहीं बदल पाया है . क्या आवश्यकता से ज़्यादा बड़ी परिकल्पना व ज़मीनों का अधिग्रहण कर लिया गया था ? क्या सरकारी मशीनरी पूरी तरह से कार्य करने में फलोत्पादक नहीं थी ? क्या प्रोजेक्ट की धीमी गति ने प्रदेश की आम जनता के बीच इस प्रोजेक्ट के समय पर ना कंप्लीट होने से इसके वर्तमान में फेल हो जाने का संशय पैदा कर दिया है . हज़ारों करोड़ के पूंजी निवेश व उसके ब्याज़ के सही उपयोगिता नहीं हो सकने के लिये क्या किसी भी जन प्रतिनिधि, अधिकारी, विभाग इत्यादि की वैधानिक जवाबदारी नहीं बनती है . ऊपर से विभागीय वेब साइट में काम की लागत के एस्टीमेट व उसमें हुए खर्च का अंतर , देर का असर इत्यादि की पार्दर्शिता गायब है . अनेक प्रश्न अनुत्तरित हैं . अब स्थानीय जनप्रतिनिधि भी जनता के साथ खड़ॆ होकर सवाल पूछने लगे हैं . इन्हीं के बीच पूरब टाइम्स की एक रिपोर्ट ( भाग -1 ) ….

भाजपा शासन काल में प्रदेश की जानता को एक लुभावने परियोजना की जानकारी मिली . वह यह कि छत्तीसगढ़ की राजधानी कई हज़ार एकड़ में फैली होगी और छत्तीसगढ़ के वैभव व विलासिता की पहचान बनेगी . जैसे ही इस तरह की जानकारी शासकीय फाइलों से निकलकर जनता के बीच फैली थी , तब प्रदेश वासियों की तरह नया रायपुर स्थित देहातों के किसान भी बेहद खुश हुए थे . उन्हें लगा था कि यह परियोजना भविष्य में उन्हें राजधानी का निवासी होने का गौरव दिलवाएगी लेकिन जैसे – जैसे यह परियोजना आकार लेने लगी तो स्थानीय किसानों को विस्थापन के दंश की वेदना का अहसास हुआ और एक दिन ऐसा भी आया जब वे अपने ही मिट्टी से उखाड़ कर अलग कर दिए गए . अब स्थिति यह है कि नियमानुसार मुआवजा लेने के लिए भी किसान सरकारी अफसरों की चौखट पर सिर झुकाने को मजबूर हो गया है .

जैसा कि विगत कांग्रेस के शासन काल में अफसरशाही का बोलबाला था ,  ठीक वैसी ही निरंकुश अफसरशाही वर्तमान में भी नया रायपुर डेवलपमेंट ऑथोरिटी के कार्यालय में अपना अस्तित्व जमाए हुवे है और यह  प्रदेश सरकार को चुनौती दे रहीं है . गौर तलब रहे कि इस तरह के  आरोप नया रायपुर क्षेत्र के लोग लगा रहे हैं . व्यथित करने वाली बात यह भी है कि ऐसे आरोप विगत कई वर्षों से लग रहे थे इसलिए विष्णुदेव साय सरकार ने नया रायपुर डेवलपमेंट ऑथोरिटी के मुखिया के रूप में एक ऐसे व्यक्ति को कमान सौंपी है , जिसको प्रशासन का लंबा अनुभव है . इसलिए अब लोगों को यह उम्मीद है कि जल्द ही नया रायपुर क्षेत्र के किसानों और अन्य विस्थापितों की समस्याओं का समाधान निकलेगा और आने वाले समय में सभी की लंबित उम्मीद पूरी हो जाएंगी .

सर्व विहित है कि जब अफसरशाही किसी भी शासकीय योजना पर हावी हो जाती है , तब सबसे पहले अफसरशाही उस शासकीय योजना की कार्यवाहियों की पारदर्शिता को जकड़ लेती है . इसके बाद शासाकीय कार्यालय की कार्यवाहियों की पारदर्शिता , अफसरशाही के हाथो की कतपुतली बन जाती है . नया रायपुर डेवलपमेंट ऑथोरिटी भी वर्तमान में अफसर शाही की कठपुतली बनकर भ्रष्टाचार के समक्ष नक्मस्तक नजर आ रही है . नया रायपुर क्षेत्र के विस्थापित किसान इस बात का प्रमाण हैं कि नया रायपुर डेवलपमेंट ऑथोरिटी की कार्यवाहियों मे बहुत कुछ असामान्य है और सक्षम अधिकारियों की तानाशाही रवैये को नजरंदाज करने वाले बड़े ओहदेदार सभी विवादित मामलों को दबाने की नाकाम कोशिश कर रहे है . लेकिन इस बीच नया अफसर जो कि प्रशासन के मामलों को सुलझाने का अद्वितीय अनुभव रखता है , वह नया रायपुर डेवलपमेंट ऑथोरिटी की कमान संभाल चुका है और ऐसे गंभीर आरोपों वाली खबरों पर विराम  लगाने की पहल करेगा , ऐसा सभी की लगता है .

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