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Sunday, March 1, 2026
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देवी नहीं यहां होती है बिल्ली की पूजा और मृत्यु पर होता है अंतिम संस्कार

मांड्या जिले के बेक्कलाले गांव में बिल्ली की पूजा एक अनोखी परंपरा के रूप में विकसित हुई है। इस गांव के लोग बिल्लियों को देवी मानते हैं, खासकर मंगम्मा देवी के रूप में, और उनका विश्वास है कि बिल्लियों की पूजा से जीवन में सुख और समृद्धि आती है। यह परंपरा इतनी प्रगाढ़ है कि गांव का नाम भी बिल्लियों के नाम पर रखा गया है।

गांव के बुजुर्गों के अनुसार, कई साल पहले एक बिल्ली की समाधि बनाई गई थी, और उसी के बाद उसे देवी का दर्जा दिया गया। इस परंपरा के अनुसार, हर मंगलवार को गांव में एक विशेष पूजा आयोजित की जाती है, जिसमें भक्तगण देवी मंगम्मा के दर्शन करने आते हैं और पूजा करते हैं। इस पूजा में खास बात यह है कि यहां के लोग प्रसाद के रूप में लड्डू या पेड़ा नहीं, बल्कि बिल्ली के थूक को स्वीकार करते हैं। उनका विश्वास है कि बिल्ली का थूक शुभ होता है और इससे जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

यहां के लोग बिल्लियों से इतना प्रेम करते हैं कि अगर कोई किसी बिल्ली को नुकसान पहुंचाता है, तो उसे गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ता है। उनके अनुसार, बिल्ली को नुकसान पहुंचाना किसी अनहोनी का कारण बन सकता है। इसके अतिरिक्त, यदि किसी बिल्ली की मृत्यु होती है, तो उसका अंतिम संस्कार भी मानवों की तरह पूरी विधि-विधान से किया जाता है।

बेक्कलाले गांव के लोग मानते हैं कि बिल्ली मंगम्मा की कृपा से उनकी इच्छाएं पूरी होती हैं। चाहे वह घर की सुख-शांति हो, सेहत से जुड़ी समस्याएं हो, या शादी-ब्याह की चिंता—यहां के लोग अपनी समस्याओं का समाधान पाने के लिए देवी मंगम्मा के दरबार में पहुंचते हैं। लोग विश्वास करते हैं कि सच्चे मन से मांगी गई मुरादें जरूर पूरी होती हैं, और यही कारण है कि दूर-दूर से लोग यहां आकर अपनी समस्याओं का समाधान ढूंढने आते हैं।

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