दिल्ली उच्च न्यायालय ने छात्रों के शिक्षा के अधिकार और राष्ट्रीय राजधानी में जारी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के काम के बीच संतुलन बनाने की जरूरत पर जोर दिया। इसने निर्वाचन आयोग से कहा कि वह इस प्रक्रिया के लिए लगाए गए सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों की स्थिति के प्रति ‘‘संवेदनशील’’ रहे और यह सुनिश्चित करे कि उन पर काम का अत्यधिक बोझ न डाला जाए।
दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने मंगलवार को कहा कि मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) निस्संदेह ‘‘महत्वपूर्ण’’ है, लेकिन इसने चुनाव संबंधी काम में बाधा न डालने को लेकर प्रधानाचार्यों को दिए गए निर्वाचन आयोग के आदेश की ‘‘धमकी भरी भाषा’’ पर अप्रसन्न्ता जताई।
पीठ ने प्राधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि वे इस बात का ध्यान रखें कि लंबे समय तक स्कूल में काम करने के बाद बूथ स्तरीय अधिकारी (बीएलओ) और गणना कर्मियों के रूप में लगाए गए शिक्षकों पर अनावश्यक दबाव न पड़े। इसने निर्वाचन आयोग से कहा, ‘‘हम आपसे केवल इतना चाहते हैं कि आप उनकी स्थिति के प्रति थोड़ा संवेदनशील रहें।
हम आपके अधिकार को कम नहीं कर रहे हैं। हम उन मानवीय परिस्थितियों को समझ रहे हैं, जिनसे ये शिक्षक गुजर रहे हैं। किसी भी शिक्षक से 11 घंटे काम करने की अपेक्षा करना… ज्यादातर शिक्षक महिलाएं हैं। उनके बच्चे और परिवार हैं। आपको उनकी परिस्थितियों को मानवीय दृष्टिकोण से देखना होगा। आदेश जारी करते समय आपने किस तरह की का इस्तेमाल किया है? क्या आप भय पैदा करना चाहते हैं?’’


