Episode – 31
उसकी मीठी बातें दिल पर तीर चला रहीं थीं . मैंने पूछ ही लिया कि वह हसीन मुलाक़ात कब और कहां होगी ? क्या आज ही होगी या आज की ना कटने वाली रात के बाद होगी . वह बोली , अब आप फिर से रोमंटिक हो रहे हैं , जबकि मैं संजीदा बातें कर रही हूं . आखरी मुलाक़ात के पहले की बात कर रही हूं . मैंने अभी भी अपना रवैया नहीं छोड़ा और बोला , ऐसे बोल रही है गोया इसके बाद मलिका , बन्दे को धरती पर छोड़कर चांद पर जा रही हों , हमेशा के लिये . वह रुआंसी सी होकर बोली , कुछ ऐसा ही समझो . अब मेरे पास दिन बहुत कम है . मैं बुरी तरह से घबरा गया , क्या मतलब ? क्या कोई बीमारी या ऐसी वैसी बात ? मैं तुम्हारा दोस्त पहले हूं , मुझसे छुपावट ? मेरी आवाज़ अब गुस्से से कांपने लगी थी . तुम हंसी और बोली , ज़रा सा भी सस्पेंस , बर्दाश्त नहीं कर सकते हो तो आगे कैसे निभाओगे ? अब मैं भी ‘हम दोनो’ फिल्म का देवानंद बनकर गाने लगा –
अधूरी आस छोड़ के, अधूरी प्यास छोड़ के जो रोज़ यूँ ही जाओगी, तो किस
तरह निभाओगी कि ज़िंदगी की राह में, जवाँ दिलों की चाह में कई मक़ाम
आएंगे, जो हमको आज़माएंगे बुरा न मानो बात का, ये प्यार है गिला नहीं ।
मेरे चुप होते ही तुम बोल पड़ी . आप गाते भी बहुत अच्छा हैं , मुझे आपका यह हुनर भी बहुत अच्छा लगा . सच ध्रुव , आप बहुत ही अच्छे हैं . मैंने सोचा था , उससे भी बहुत
बेहतर . बोलते बोलते उसकी आवाज़ भर्रा उठी , मानो उसे रोना आ रहा था . सुनकर मुझे भी रोना आने लगा . मैं खुदको कंट्रोल करते हुए बोला , अच्छा अब यह सब बंद करते हैं और बताओ कब और कहां हुस्ने मलिका के दीदार करने आना है ? अब तुम हंस पड़ी और बोली , बातों से घायल करना तो कोई आपसे सीखे . वैसे मैं कल अपनी सहेली के घर दोपहर 12 बजे जाऊंगी , घर में शाम तक लौटने का बता कर , सो अब हम कल हम 2 बजे मिलते हैं . नेहरू पार्क में उसी जगह पर . फोन पर बाय कर मैं वापस होस्टल लौटा . मेरी भूख प्यास जैसे गायब हो गयी थी . मैने सुबह से ही कुछ भी नहीं खाया पिया था . अपने कमरे में जाकर चुपचाप लेट गया . रूम पार्टनर आया और बोला , क्या तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है ? चेहरा एकदम उतरा हुआ लग रहा है . खाना खाया या नहीं खाया ? मैंने कहा , कुछ भी करने का मन नहीं है . सुबह से कुछ भी खाने का मन नहीं हुआ . वह मुझसे ज़बर्दस्ती करते हुए बोला , दो दिन से इस हाल में देख रहा हूं. या तो तू मेरी तरफ से चीकू शेक पीने चल या फिर डॉक्टर को दिखाने . मैंने पहला ऑप्शन चुनने में अपनी भलाई समझी . जब हम लौट के आये तो मैं फिर से अपने पुराने रूप में आ गया था वही बिंदास व अलमस्त . उसने मुझसे इन दिनों की उदासी का कारण पूछा . मैंने कुछ नहीं बताया तो उसने ज़ोर नहीं डाला. मैं फिर से अपने कल्पना लोक में उड़ने लगा और एक अजीब ओ गरीब शेर मेरे जहन पर बनने लगा …
पार्क में वो इंतज़ार करते होंगे, जुदा होने के लिये
सोचते होंगे साथ छोड़ने का पल कभी ना आये
जी चाहता होगा कि कभी ये हमारा साथ ना छूटे
जिसका ना यक़ीं है, शायद वो ही करामात हो जाये


