दुनिया में बायकॉट का मतलब होता है दूर रहना, लेकिन पाकिस्तान का ‘बायकॉट’ थोड़ा हटके है। ये दुनिया का पहला ऐसा बहिष्कार है जिसमें टीम मैच भी खेलना चाहती है, पैसे भी ज्यादा चाहिए और विपक्षी खिलाड़ियों से ‘टच’ (हैंडशेक) भी होना है। इसे बायकॉट नहीं, ‘इंटरनेशनल बेइज्जती का तड़का’ कहना ज्यादा सही होगा। पहली मांग: सालाना फंडिंग बढ़ाओ। वाह! काम ऐसा कि वर्ल्ड कप से बाहर होने की नौबत आ जाए और डिमांड ऐसी कि तिजोरी भर दी जाए। एक तरफ कह रहे हैं, “हम भारत के साथ नहीं खेलेंगे, बायकॉट करेंगे।” और दूसरी तरफ शर्त रख रहे हैं कि “हमारे साथ द्विपक्षीय सीरीज शुरू करो।” यह तो वही बात हुई कि रूठी हुई प्रेमिका कह रही है— “मुझसे बात मत करो, पर शाम को डिनर पर ले जाना मत भूलना!” तीसरी शर्त तो ऐसी है कि सुनकर हंसी के फव्वारे छूट जाएं। पीसीबी चाहता है कि आईसीसी ‘हैंडशेक’ सुनिश्चित करे। मतलब, मैदान पर मैच खेलने की हिम्मत नहीं है, लेकिन हाथ मिलाने की गारंटी चाहिए। ऐसा लगता है जैसे पाकिस्तानी खिलाड़ी मैदान पर क्रिकेट खेलने नहीं, बल्कि ‘इज्जत’ बटोरने जा रहे हैं। कहीं अगली शर्त ये न हो कि भारतीय खिलाड़ी विकेट लेने के बाद ‘सॉरी’ भी बोलें! पीसीबी को समझना चाहिए कि क्रिकेट बैट से खेला जाता है, शर्तों की पर्चियों से नहीं। ‘गरीबी में आटा गीला और पीसीबी का नखरा सबसे नशीला’, जेब में नहीं दाने, फिर भी चले आईसीसी को अपनी शर्तें सुनाने।
इंजी. मधुर चितलंग्या , संपादक , दैनिक पूरब टाइम्स, भिलाई


