विपक्ष को लगता है कि एक केस गिर गया तो युद्ध जीत लिया, पर वे भूल जाते हैं कि सरकारी तरकश कोई साधारण झोला नहीं है, वह ‘जादुई पिटारा’ है. एक फाइल बंद होती है, तो दूसरी अलमारी से खुद-ब-खुद नीचे गिर जाती है. शराब नहीं तो पानी, पानी नहीं तो विज्ञापन, विज्ञापन नहीं तो शायद ‘हवा’ का घोटाला! नियम सरल है: जब तक नेताजी थक हार न जाएं , उन्हें फाइलों के चक्रव्यूह में घुमाते रहो. वैसे जब नेता जेल जाता है, तो वह ‘क्रांतिकारी’ कहलाता है और जब बाहर आता है, तो ‘विक्टिम कार्ड’ का सुल्तान. यहां तो जेल यात्रा बायोडाटा में एक ‘एडिशनल क्वालिफिकेशन’ की तरह है. असली मुआवजा तो तब माना जाता है, जब चुनाव में सहानुभूति के वोट ‘कैश’ हो जाए. बदनामी तो राजनीति का श्रृंगार है. बिना दाग के नेता वैसा ही लगता है जैसे बिना तड़के की दाल—बिल्कुल फीका. दिल्ली में पिछला चुनाव हारने के सौ कारण हो सकते हैं, लेकिन ‘शराब घोटाला’ सबसे हिट रहा. तत्कालीन विपक्ष ने इसे ऐसे पेश किया जैसे पूरी दिल्ली के नलों से पानी की जगह व्हिस्की बहने वाली थी. जनता को लगा कि अगर इन्होंने शराब सस्ती कर दी, तो दूध महंगा हो जाएगा. भारतीय मतदाता को नीति समझ आए न आए, ‘घोटाला’ शब्द सुनते ही वह कान खड़े कर लेता है. यह एक ऐसा ‘परसेप्शन’ है जिसे धोने में वर्षों लग जाते हैं, चाहे कोर्ट क्लीन चिट दे दे या गंगाजल छिड़क दिया जाए.
इंजी. मधुर चितलांग्या , संपादक , पूरब टाइम्स


