दिल्ली उच्च न्यायालय ने सैनिकों के लिए विकलांगता पेंशन को बरकरार रखा राष्ट्र का नैतिक कर्तव्य बताया

​दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में दो पूर्व सैनिकों को विकलांगता पेंशन प्रदान करने का आदेश देते हुए इसे राष्ट्र का नैतिक कर्तव्य करार दिया है। न्यायमूर्ति सी. हरिशंकर और न्यायमूर्ति अजय दिगपॉल की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि जो सैनिक अपने प्राणों की बाजी लगाकर देश की रक्षा करते हैं, उन्हें उनके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। ​

पहला मामला पूर्व सूबेदार गवास अनिल माडसो का है, जिन्होंने 1985 में सेना में भर्ती होकर 34 वर्षों तक सेवा की। सेवा के दौरान उन्हें डायबिटीज मेलिटस टाइप-2 हो गया, जिसके कारण उन्हें 2015 में सेवा से हटा दिया गया। रिलीज मेडिकल बोर्ड ने उनकी विकलांगता को 20 प्रतिशत स्थायी माना, लेकिन विकलांगता पेंशन देने से इनकार कर दिया। दूसरा मामला अमीन चंद का है, जिन्होंने 2005 में सेना ज्वाइन की और 2020 में सेवानिवृत्त होने वाले थे। सेवा के दौरान उन्हें परिधीय धमनी संकुचन रोग हो गया, लेकिन विभाग ने विकलांगता पेंशन से वंचित कर दिया। ​

उच्च न्यायालय ने इन मामलों में केंद्र सरकार की अपीलों को खारिज करते हुए कहा कि सैनिकों की निस्वार्थ सेवा के लिए कृतज्ञता के भाव के रूप में समर्थन और करुणा प्रदान करना राष्ट्र का नैतिक दायित्व है, जिससे उन्हें आने वाले वर्षों में सांत्वना और सुरक्षा मिले। ​

इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने भी सेवानिवृत्त सैन्यकर्मियों की पेंशन के मुद्दे पर केंद्र सरकार को नीति बनाने का निर्देश दिया था, ताकि पूर्व सैनिकों को पेंशन के लिए अदालतों में न भटकना पड़े। ​

इन फैसलों से स्पष्ट होता है कि न्यायपालिका सैनिकों के अधिकारों और उनके कल्याण के प्रति संवेदनशील है, और सरकार को उनके हितों की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।​

More Topics

स्व-सहायता समूह की महिलाओं ने हुनर से संवारी राखियों की खूबसूरती

मोती, धान-चावल, बीज और रक्तमौली धागों से तैयार राखियों...

नशामुक्त युवा, विकसित भारत की पहचान: विद्यार्थियों ने लिया सामूहिक संकल्प

प्रधानमंत्री के आह्वान एवं भारत सरकार के युवा कार्यक्रम...

इसे भी पढ़े