सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम समुदाय में किसी पति के खुद उपस्थित हुए बिना अपने किसी वकील के माध्यम से तलाक भेजने की प्रथा पर सख्त नाराजगी जाहिर की है और सवाल उठाए हैं कि क्या किसी सभ्य समाज में इसकी इजाजत दी जा सकती है?
जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने संकेत दिया कि पीठ तलाक-ए-हसन प्रथा को रद्द करने पर विचार कर सकती है। बेनज़ीर हीना बनाम भारत संघ एवं अन्य के मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्जल भुयान और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह भी संकेत दिया कि वह इस मामले को पाँच न्यायाधीशों की पीठ को सौंप सकती है।
क्या है तलाक-ए-हसन?
तलाक-ए-हसन मुसलमानों में तलाक का एक रूप है, जिसके माध्यम से एक पुरुष तीन महीने की अवधि में हर महीने एक बार तलाक शब्द कहकर विवाह को समाप्त कर सकता है। इसमें पति किसी के माध्यम से ऐसा करवा सकता है। तलाक-ए-हसन के तहत, तीसरे महीने में तलाक शब्द के तीसरी बार उच्चारण के बाद तलाक औपचारिक रूप से संपन्न हो जाता है, बशर्ते, इस अवधि के दौरान दोनों के बीच शारीरिक संबंध फिर से शुरू नहीं हुआ हो। हालांकि, अगर पहली या दूसरी बार तलाक कहने के बाद दोनों पक्ष साथ रहना फिर से शुरू कर देते हैं तो यह मान लिया जाता है कि दोनों पक्षों के बीच सुलह हो गई है।


