Total Users- 1,201,804

spot_img

Total Users- 1,201,804

Wednesday, April 15, 2026
spot_img

बालाघाट में महाराष्ट्र की लोक कला ‘खड़ा तमाशा’: मनोरंजन के साथ जागरूकता का संदेश

मध्य प्रदेश का बालाघाट जिला अपनी अनोखी भौगोलिक स्थिति के कारण छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र की संस्कृति का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। जिले के पूर्वी हिस्से में छत्तीसगढ़ की संस्कृति झलकती है, जबकि दक्षिणी भाग में महाराष्ट्र की लोक परंपराओं का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इस सांस्कृतिक समन्वय का सबसे सुंदर उदाहरण है महाराष्ट्र की पारंपरिक लोककला ‘खड़ा तमाशा’, जो दक्षिणी बालाघाट में बेहद लोकप्रिय है।

दक्षिणी बालाघाट में महाराष्ट्र लोक संस्कृति के कार्यक्रम

खड़ा तमाशा महाराष्ट्र की प्राचीन लोककला है, जिसे देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। यह कला दिनभर या पूरी रात चल सकती है, लेकिन इसके प्रशंसक कभी ऊबते नहीं हैं। यह आयोजन मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता का भी संदेश देता है।

खड़ा तमाशा का ऐतिहासिक सफर

लोककला से जुड़े वरिष्ठ कलाकार शायर अंबादास नागदेवे बताते हैं कि वे पिछले 50 वर्षों से इस परंपरा से जुड़े हुए हैं। यह कला छत्रपति शिवाजी महाराज के शासनकाल में विकसित हुई थी, जब पत्रकारिता उतनी प्रभावी नहीं थी और जनजागरण के लिए इस कला का उपयोग किया जाता था। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने भी इस कला का उपयोग सामाजिक और राजनीतिक जागरूकता फैलाने के लिए किया था।

प्राचीन समय में जब मनोरंजन के सीमित साधन थे, तब खड़ा तमाशा अत्यधिक लोकप्रिय था। लेकिन आधुनिकता के प्रभाव और बदलते सामाजिक परिवेश के कारण यह कला धीरे-धीरे लुप्त होने की कगार पर पहुंच रही है।

मनोरंजन के साथ सामाजिक संदेश

शायर अंबादास नागदेवे के अनुसार, खड़ा तमाशा केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें दहेज प्रथा, महिला सशक्तिकरण, बेटी बचाओ, बंधुआ मजदूरी जैसी सामाजिक बुराइयों पर व्यंग्य करते हुए जागरूकता के संदेश दिए जाते हैं।

इस कला में एक शायर (मुख्य प्रस्तुतकर्ता) होता है, जो अपने सहयोगी के साथ कहानी प्रस्तुत करता है। नाटक की आवश्यकता के अनुसार कलाकार विभिन्न किरदार निभाते हैं, जिनमें पुरुष और महिला भूमिकाएं शामिल होती हैं। संगीत के लिए ढोलक, मंजीरा, चोंदका और कॉर्नेट का उपयोग किया जाता है।

महिला किरदार निभाने वालों की चुनौतियां

खड़ा तमाशा में महिलाओं की भूमिकाएं प्रायः पुरुष कलाकार निभाते हैं। इस कला से जुड़े कलाकार निखिल गायकवाड़ बताते हैं कि जब उन्होंने महिला किरदार निभाने का निर्णय लिया, तो परिवार और समाज से काफी विरोध झेलना पड़ा। हालांकि, समय के साथ उनके परिवार ने इसे स्वीकार कर लिया, लेकिन समाज का एक तबका अब भी इस पर तंज कसता है।

मंच पर प्रस्तुति देते समय कई बार लोग मनोरंजन और संदेश से ज्यादा अश्लीलता खोजने की कोशिश करते हैं, लेकिन कलाकार इसे नजरअंदाज कर अपनी कला को जीवंत बनाए रखते हैं।

लोककला को बचाने की जरूरत

बदलते समय के साथ खड़ा तमाशा जैसे पारंपरिक लोकनाट्य धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं। ऐसे में कलाकारों का मानना है कि सरकार और समाज को इस कला को बचाने के लिए आगे आना चाहिए, ताकि यह समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर आने वाली पीढ़ियों तक पहुंच सके।

More Topics

दो दिवसीय दौरे पर चीन पहुंचे रूसी विदेश मंत्री लावरोव

बीजिंग । पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच...

बिहार में नए मुख्यमंत्री के रूप सम्राट चौधरी कल लेंगे शपथ

बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव सामने आया है।...

इसे भी पढ़े