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Sunday, February 8, 2026
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Astrology Advice: 16 साल उम्र तक के जातक को शनि देव नहीं देते कोई कष्ट, जानिए इसके पीछे मी वमह

ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों का विशेष महत्व बताया गया है और इनको दो भागों में विभक्त किया गया है। वहीं द्वितीय अशुभ ग्रह की श्रेणी में आते हैं। शुभ ग्रहों में बुध, चंद्र, गुरु और शुक्र हैं। तो वहीं अशुभ ग्रहों में राहु, केतु, मंगल और शनि हैं। ज्योतिष में सूर्य देव को भी अशुभ ग्रह की श्रेणी में रखा जाता है। हालांकि सूर्य आत्मा के कारक हैं। वहीं राहु-केतु के साथ युति होने पर सूर्य का शुभ प्रभाव व्यक्ति पर नहीं पड़ता है। वहीं शनिदेव के साथ रहने पर शनिदेव का प्रभाव बढ़ जाता है। जब किसी जातक की कुंडली में सूर्य, मंगल और शनि के मजबूत होने पर व्यक्ति के जीवन में किसी प्रकार की कोई समस्या नहीं होती है।मॾयोतिय की मानेत धो ममिदेव को म्याय का देवता मॾ कॾमॾसॾ मामा माधा है। हनिदेव को यह वरदान भगवान शिव से मिला है। हनि देव हर रा���ि में ढाई साल रहते हैं। शनि के कोचर से व्यक्ति को साढॼे साती से कुमरना पॾटय़ॾ है। म২ि की णोय्या ढाई साल की होती है। बता दें कि 19 सालों तक शनि की महादशा रहती है। इस दौरान व्यक्ति के जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव देट२े को मिलते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि शनिदेव 16 साल की आयु तक कॿसी भी जातक को कष्ट नहीं पेते हैं। 16 साल की आयु तक जातक शनिदोष से मुक्त रहता है। ध৮े में आम इम्टिकह के ममिए हम आपको इससे मुडॼी पौमাणिम कथा के मॾমॾॾॾॾ मॾसॾ कॾसॾ मॾसॾ मॾय़ॾ मॾ।ॾसॾतॾतॾसॾ

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ऋषि धिप्पला

स्कंद पुमाण के मुतामिक ऋषि पिप्पलाद महाम दामॾमिक कम मचरॾमिमत कर मचमाकामस बतাयम माता है कि अथर्ववेद का मंकलन शषि पिप्मलाद मे किमातॾहॾद मे किणा है। अषि भामद्वाम भी शषि पिप्पहाद की परीक्षम हेमे के हिए अॾते कॾसॾ मॾसॸ तब शषि पिप्पहमद मे अपमे मवामोत से साी को आम्चर्यचकित कर दिया था। तऴ शषणद्वाम समेत अम्य शषियोत मे पिप्पलाद को भकवाममत को भगवाम मिवस मिसॾस मॿसॾसॾर मतााार ममॾतॾतॾत श৷ण ने अपमे तपोमॹ मे मॾणमय के कोलह मॾह तश कॿसी भी मॿहॕ मो मॿह८ॾ मो मॿॾॾम न केमॾॾम मो।बताया जाता है कि ऋषि पिप्पलाद का बचपन काफी संकटमय तरीके से बीता था। जिसका कारण शनिदेव को माना गया। तब ऋषि ने शनिदेव को कहा कि वह न्याय करने के दौरान बच्चे को मुक्त रखें। कथा प्राप्त जानकारी के अनुसार, ऋषि पिप्पलाद के माता-पिता को लेकर शास्त्रों में विभिन्न मत हैं। स्कंद पुराण के मुताबिक ऋषि पिप्पलाद के पिता का नाम ऋषि दधीचि और माता का नाम सुभद्रा था। जब माता सुभद्रा मां बनने वाली थीं। तभी स्वर्ग लोक पर वृत्रासुर नामक असुर ने अधिपत्य स्थापित कर लिया था और तीनों लोगों में उसका वर्चस्व कायम हो गया था। वृत्रासुर को किसी अस्त्र-शस्त्र से नहीं मारा जा सकता था। तब सभी देवता ब्रह्म देव के पास गए और उनको असुर के आतंक की जानकारी दी। तब ब्रह्म देव ने कहा कि वृत्रासुक को किसी भी अस्त्र-शस्त्र से नहीं बल्कि पृथ्वी पर मौजूद महान ऋषि दधीचि की अस्थियों से बने वज्र से मारा जा सकता है। यदि ऋषि अपनी अस्थियों का दान करते हैं, तो समस्त लोकों का कल्याण हो जाएगा। तब सभी देवता ऋषि दधीचि के पास पहुंचे और ऋषि ने देवताओं की विनती स्वीकार कर ली।जिसके बाद ऋषि दधीचि ने समाधि बनाई और तप विद्या के प्रभाव से पंचतत्व में विलीन हो गए। फिर ऋषि की अस्थियों से वज्र और सुदर्शन चक्र मिला। जब ऋषि की पत्नी को यह जानकारी मिली, तो उन्होंने अपने गर्भ में पलने वाले बालक को पीपल देव को सौंप दिया और खुद पति के साथ सती हो गईं। यह नवजात और कोई नहीं बल्कि ऋषि पिप्पलाद थे। बाल्यावस्था में पिप्पलाद ने मिले कष्टों का कारण शनि देव को माना। तब ऋषि पिप्पलाद क्रोधित होकर शनिदेव को सबक सिखाने के लिए भोलेनाथ की कठिन तपस्या करने लगे। हालांकि भगवान शिव ने उनके क्रोध को शांत किया और शनि देव को ऋषि पिप्पलाद की शरण में आना पड़ा। उस समय ऋषि ने शनिदेव को यह कहकर क्षमा कर दिया कि अब तक 16 साल की आयु तक किसी भी बच्चे को कष्ट नहीं देंगे।

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