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Sunday, March 22, 2026
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ज़मीनों का सीमांकन, बटांकन व नामांतरण के लिये होने लगी भारी परेशानी , चलने लगा लाखों रुपयों का खेल

पूरब टाइम्स, राजनांदगांव, रायपुर . इन दिनों ज़मीनों के राजस्व रिकॉर्ड में सुधार, सीमांकन, बटांकन, नामांतरण इत्यादि कार्य करवाना बेहद जटिल हो गया है. जबकि माना यह जा रहा था कि छ.ग. शासन के राजस्व रिकॉर्ड के ऑनलाइन प्रोग्राम ‘ भुइयां’ के बाद सबकुछ बेहद सरलता व तरलता से चलेगा. शासन द्वारा नये नियमों व बार बार नये निर्देश के कारण भू स्वामी बेहद असहज हो गये हैं . नियमानुसार राजस्व के ऑनलाइन रिकॉर्ड में सभी खसरे व रजिस्ट्रियों और ऋण पुस्तिकाओं के अनुसार सभी खसरे व नाम चढ़ जाने चाहिये थे परंतु अभी तक अनेक राजस्व सर्कल में ऐसा नहीं हो पाया है. अभी भी बी 1 व खसरा नक्शा , ऑन लाइन में अपडेट नहीं हैं, इस कार्य को करने के लिये पटवारी अपने सहयोगियों के माध्यम से बड़ी रकम की घूस की मांग करने लगे हैं . पूरब टाइम्स की एक रिपोर्ट( खबर अगले अंकों मे ज़ारी रहेगी ) ..

आजकल ज़मीनों की कीमतें आसमान को छूने लगी हैं ,इसके अलावा अवैधिक रूप से कब्ज़े भी होने लगे हैं . जब किसी भूमि का मालिक बहुत दिनों तक अपनी ज़मीन की सुध नहीं लेता है तो कुछ ज़मीन दलाल व माफिया सक्रिय हो जाते हैं . कई बार वे उस खाली ज़मीन कोदिखाकर किसी ग्राहक की रजिस्ट्री करवा देते हैं और उस खाली ज़मीन का पज़ेशन भी दे देते हैं . जब उसके असली मालिक को खबर लगती है तो वह आकर अपनी ज़मीन के लिये झगड़ा करता है . ऐसे समय में दोनों दावा करने वालों का फैसला राजस्व रिकॉर्ड के हिसाब से पटवारी व आरआई मौके पर नाप लेकर करते हैं . यह नापने की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि अलग अलग लैंड मार्क से नाप करने पर , उस ज़मीन की स्थिति अलग अलग आ सकती है. इस बात का लाभ राजस्व के कर्मचारी उठाकर , कब्ज़ा को दिखाते हुए , उस अपनी सेटिंग व पसंद वाले की तरफ पलड़ा झुका देते हैं. फिर शुरू होता है पैसों का खेल व कानूनी प्रक्रिया . अनेक बार सही समाधान निकलने में बरसों लग जाते हैं तब तक मौके पर काबिज आदमी , उस जगह पर पक्का निर्माण तक कर लेता है . बाद में समाधान में बेहद मुश्किल आ जाती है .

ऐसा करने से ज़मीन का मालिक थक हार कर निराश होकर , दलाल ढूंढने लगता है जोकि मनमानि राशि वसूल कर , राजस्व विभाग के कर्मचारियों से सेटिंग कर काम को अंजाम दिलवाता है. कई बार इस प्रकार के संशोधन में थोड़ी जटिलताएं भी होती हैं, उस केस में लाखों रुपये की मांग करना भी आजकल आम बात होने लगी है . इन बातों का लाभ अविधिक ज़मीन व्यापार करने वाले बहुत अधिक लेते हैं और वे राजस्व के कर्मचारियों के संरक्षण में लगातार जालसाज़ी कर लंबा चौड़ा पैसा बना लेते हैं. मूल मालिक को इस तरह से अलग अलग तरह के सीमांकन दिखाकर फंसा दिया जाता है कि वह भी सिविल कोर्ट में केस लगाने के बाद भी बरसों तक सही रिकॉर्ड नहीं प्राप्त कर पाता है. इस बात के कारण वह भी दलालों के चक्कर में पड़कर शॉर्ट कट पाने के लिये लाखों रुपये खर्च करने तैयार हो जाता है

पटवारी व आरआई को ज़मीन के नाप , नक्शे व मौके की इतनी ज़्यादा जानकारी होती है कि वे किसी भी ज़मीन मालिक को गुमराह कर सकते हैं. अनेक बार चौहद्दी को दो चांदे से वैरीफाई किये बगैर किया गया सीमांकन , सही नहीं होता है. जब बदली होने के बाद दूसरे आरआई पटवारी आते हैं तो वे उसी ज़मीन को किसी दूसरी जगह दिखाकर सीमांकन रिपोर्ट दे देते हैं. अब यह तो फैक्ट होता है कि उनमें से कम से कम एक सीमांकन रिपोर्ट गलत है परंतु पुनः जांच होने के बाद जो रिपोर्ट गलत थी उसको बनाने वाले आरआई पटवारी पर किसी तरह की बड़ी कार्यवाही नहीं होने से , वे अपनी कार्यशैली में सुधार नहीं ला रहे हैं . केवल इतना ही नहीं कई बार एक ही पटवारी बिना सेमांकन रिपोर्ट दिये , ज़मीन मालिक को गलत मौका दिखा देता है जोकि बाद में उक्त मालिक के गले की हड्डी बन जाता है .

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